रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ रसतरङ्गिणी आयामविस्तरेति आयामे विस्तारे च समा, विस्तृतं आस्यं मुखं यस्याः सा विस्तृतास्या ॥ १७, १८ ॥ भा.टी.-एक ऐसा पात्र जिसकी लम्बाई-चौड़ाई सम भाग हो और मूल (नीचे की तरफ) में गोल और चपटा (जिससे जमीन में अच्छी तरह स्थिर रह सके) हो औ मोटा हो ऊपर मुख की तरफ बहुत खुला हुआ हो तो उसे महामूषा कहते हैं। इसी को स्थूलमूषा भी कहा जाता है। इस मूषा को वैद्यलोग लोह, अभ्रक, स्वर्णमाक्षिक के सत्त्वादि को पुट देने के लिए काम में लाते हैं ॥ १७, १८ ॥ वृन्ताकमूषा धत्तूरपुष्पाकारेण सच्छिद्राष्टाङ्गुलेन च । नालेन तूर्ध्वतः श्लिष्टां सुदृढ़ं द्वादशाङ्गुला ॥१६॥ वृन्ताकसदृशाकारा मूषा वृन्ताकभूषिका । साधयेत्खर्परादीनां सत्त्वं वै मूषयाऽनया ॥२०॥ वृन्ताकमूषायां धत्तूरपुष्पाभनालनिर्देशः सत्वपातसुखार्थः नालस्थ विस्तृतं मुखं मूषामुखे सन्धिवन्धनं विधेयम् ॥ १६, २० ॥ भा.टी.-बारह अंगुल लम्बी चौड़ी बैंगन के आकार की एक मूषा बनायें इसके मुख में आने योग्य एक ऐसा ढक्कन बनायें जो धतूरे के फूल के सदृश ऊपर को चौड़ा और नीचे को पतला आठ अंगुल लम्बी नलीवाला हो जिससे मूषा में द्रव्य भरकर धतूर-आकार ढक्कन को उसमें जोड़कर अग्नि में रखा जाता है। इस प्रकार से बनाई हुई मूषा को बैंगन के समान आकार होने से वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा खर्पर आदि द्रव्यों का सत्त्वपातन आदि कार्य किया जाता है ॥ १६-२० ॥ मूषाप्यायनकम् द्रव्ये द्रवोन्मुखे जाते मूषाया वह्नियोगतः । निष्कासनं क्षणं यत्तु तन्मूषाप्यायनं मतम् ॥२१॥ मूषाऽप्यायनं मूषारक्षार्थमौषधदाहनिवारणार्थञ्च । द्रवोन्मुखे जात इति तदानीं मूषाऽऽप्यायनकालो नार्वाक् ॥ २१ ॥ भा.टी.--मूषा में द्रव्य रखकर अग्नि में रखने पर जब द्रव्य मिलने लगता है थोड़ी देर के लिये उसे बाहर निकालने को मूषाप्यायन कहते हैं। इससे मूषा में अग्निसहनशक्ति बढ़ जाती है ॥ २१ ॥