भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३ तृतीयस्तरङ्गः ३३ अङ्गारधानिका अङ्गारधानिका ख्याता हसन्ती च हसन्तिका । अङ्गारशकटी चापि हसनी च निगद्यते ॥२२॥ अङ्गारधानिका ह्येषा मृदुद्रव्यप्रसाधिका । वङ्गादीनां ढालनादौ विशेषेण प्रयुज्यते ॥२३॥ अङ्गारधानिका यथार्थनाम्नी । उज्ज्वलनासादृश्याद् हसन्ती च ॥२२ २३॥ भा.टी.—कोयलों की अँगेठी को अङ्गारधानिका, हसन्ती, हसन्तिका, अँगारशकटी और हसनी नाम से कहा जाता है । यह अँगेठी मृदु द्रव्यों के लगाने और पकाने के काम आती है, विशेष रूप से राँगा तथा वंग को पिघला कर शोधन या ढालन के काम आती है ॥ २२-२३ ॥ कोष्ठिका सत्त्वादियातनार्थं द्रव्यढालनसाधिका । वह्निसन्धानिका या तु कोष्ठिका सा निगद्यते ॥२४॥ वह्निसन्धानिका सर्वतोऽवरुद्धवह्नितया सम्यग्द्रव्यतापक्री ॥ २४ ॥ भा.टी.—सत्त्वादि के पातनार्थ तथा पिघले हुए द्रव्यों के ढालनार्थ जो कोयलों की भट्टी बनायी जाती है उसे कोष्ठिका कहते हैं । इसमें चारों तरफ से रुकावट होने से अग्नि अधिक तीव्र होती है ॥ २४ ॥ अङ्गारकोष्ठिका नृपहस्तमितोत्सेधे तदर्धाय्यामविस्तृता । मध्यतश्चतुरस्रा च मृदा च परिलेपिता ॥२५॥ चतुरङ्गुलमानेन रन्ध्रेण परिशोभिता । नालिकां समकोणाञ्च रन्ध्रे तिर्यङ् निवेशयेत् ॥२६॥ नालिकाया मुखे चैव भस्त्रावक्त्रं निवेशयेत् । आपूर्य कोकिलैः कोष्ठीं द्रव्यमूषान्वितां धमेत् ॥२७॥ अङ्गारकोष्ठिका ख्याता द्रव्यढालनसाधिका । सत्त्वानां पातने चेयं विशेषाद्विनियुज्यते ॥२८॥ उत्सेधे = उच्चतायां, नृपहस्तमिता = सपादहस्तपरिमाणा, चतुरस्रा = चतुष्कोणा ॥ २५-२८ ॥ भा.टी.—समतल जमीन के ऊपर एक ऐसी भट्टी बनायें जो नृपहस्त (एक गज) ऊँची और आधा गज चौड़ी (बीच में खाली जगहवाली)