रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ५६६ भा.टी.—शुद्ध स्वर्णगैरिक एक तोला, हरिद्राचूर्ण एक तोला, सिन्दूर एक मासा और पूर्वोक्त सिक्थ तैल ६ तोला लेकर इनको यथा विधि मिलाकर मर- हम बना लें और चौड़े मुख की काँच की शीशी में रख लें । इसको गैरिक मरहम कहते हैं । यह मरहम कण्डूदाह को शान्त करता है और विविध प्रकार के व्रणों को भरने के काम में आता है ॥१३०-१३२॥ यह उपधात्वादिविज्ञानीय नाम बाईसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ रत्नविज्ञानीयस्त्रयोविंशस्तरङ्गः रत्नपदानिर्वचनम् रमणीयतरं यस्माद्रमन्तेऽस्मिन्नतीव वा । तस्माद्रत्नमिदं ख्यातं शब्दशास्त्रविशारदैः ॥ १ ॥ भा.टी. — आगे लिखे हुए हीरा आदि द्रव्यों को "रत्न" इसलिए कहा जाता है कि यह अन्य खनिजादिद्रव्यों की अपेक्षा अधिक सुन्दर होते हैं अथवा ये द्रव्य मनुष्यों को अत्यधिक प्यारे लगते हैं, अतः इनको रसशास्त्रज्ञ 'रत्न' शब्द से व्यवहार में लाते हैं ॥ १ ॥ नवमहारत्नानि हीरकं त्वथ माणिक्यं मौक्तिकं पुष्परागकम् । नीलं तार्क्ष्यञ्च वैदूर्य गोमेदं विद्रुमं तथा ॥ २ ॥ भा.टी. -- हीरा, माणिक्य, मुक्ता (मोती), पुष्पराग (पुखराज), नील (नीलम), तार्क्ष्य (पन्ना), वैदूर्य, गोमेद, प्रवाल (मूंगा); ये नौ द्रव्य महा- रत्न के नाम से कहे जाते हैं ॥ २ ॥ नवग्रहाणां रत्नानि एतानीह महारत्नान्यख्याता'न नवानि तु । माणिक्यं मौक्तिकं चैव विद्रुमं तार्क्ष्यसंज्ञकम् ॥ ३ ॥ पुष्परागः पविर्नीलं गोमेदं च विदूरजम् । नवग्रहाणां क्रमशो रत्नानि परिलक्षयेत् ॥ ४ ॥ नवग्रहाणां रत्नानि नवग्रहदैवतकानि माणिक्यादीनि । उक्तं हि "माणिक्यं तरणेर्बुधस्य गरुडोद्गारो गुरोः पुष्पकं । गोमेदं तमसः प्रवालमवनीसूनोर्विधोर्मौ- क्तिकम् ॥ नीलं मन्दगतेः कवेस्तु कुलिशं केतोर्बिडालाक्षकं । रत्नं रत्नविदो वदन्ति विहितं दाने तथा धारणे ॥" इति । क्रमशः इति रविचन्द्रभौमबुधगुरुशुक्रशनि-