रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 636, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६११ कफप्रशमनं स्निग्धं क्षयरोगनिषूदनम् । वाजीकरणमत्यन्तं ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ५८ ॥ भा.टी.—उत्तम माणिक्य भस्म मेधावर्धक, मधुररस, रसायनगुण, दीपक, उत्पादक अंगों के लिए बलदायक, आयुवर्धक तथा उत्तम वात-पित्त दोषहर है । इसके सेवन से कफ प्रकोप शान्त हो जाता है । यह अंगों में स्निग्धता उत्पन्न करती है और क्षय रोग को नष्ट करती है । इसके सेवन से उत्पादक अंगों की शिथिलता दूर होकर उनमें उत्तेजना आती है और नपुंसकता नष्ट हो जाती है ॥ ५७, ५८ ॥ अथ माणिक्यस्य मात्रा आरभ्य गुंजापादांशात् गुञ्जार्द्धप्रमितं मृतम् । माणिक्यं योजयेद्धीमान् बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५६ ॥ भा.टी.—बल काल आदि का विचार कर आवश्यकतानुसार माणिक्य भस्म की चौथाई रत्ती से लेकर आधी रत्ती तक की मात्रा प्रयोग की जाती है। ५६। माणिक्यमिहिरोदरसायनम् माणिक्यं कनकं रौप्यं तार्क्ष्यं तु समभागिकम् । कस्तूरिकाञ्च सर्वार्द्धां दत्त्वा कन्याम्भसा ततः ॥ ६० ॥ पिष्ट्वा द्विगुञ्जप्रमिता वटिकाः कारयेद्भिषक् । रसोऽयं तु समाख्यातो माणिक्यमिहिरोदयः ॥ ६१ ॥ रसायनमिदं वृष्यं बल्यं वह्निप्रदीपनम् । क्लैब्यापहं विशेषेण ध्वजभङ्गहरं मतम् ॥ ६२ ॥ माणिक्यमिहिरोदरसायनम्—तार्क्ष्यं गरुडमणिः ॥ ६०-६२ ॥ भा.टी.—माणिक्य भस्म एक भाग, स्वर्णभस्म एकभाग, रजतभस्म एक- भाग, तार्क्ष्य भस्म एक भाग और उत्तम कस्तूरी दो भाग (सबसे आधा भाग) लेकर खरल में डालकर घीकुआर के गूदे से मर्दन करके दो रत्ती की गोलियाँ बना लें । यह रस “मणिक्य मिहिरोदय” नाम से कहा जाता है । यह रस रसायन, वृष्य, बल तथा अग्निदीपक और विशेषरूप से नपुंसकता और ध्वज- भंग (नामर्दी) को दूर करता है ॥ ६०-६२ ॥ अथ मौक्तिकस्य नामानि मुक्ता मुक्ताफलञ्चैव मौक्तिकं मौक्तिकैककम् । शुक्तिजं शौक्तिकेयञ्च शशिरत्नं शशिप्रियम् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—मुक्ता, मुक्ताफल, मौक्तिक, शुक्तिज, शौक्तिकेय, शशिरत्न तथा शशिप्रिय ये सब नाम मोती के कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥