भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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६१० रसतरङ्गिणी माणिक्यमारणम्—शिला मनःशिला, आलं हरितालम्, गन्धः गन्धकः, प्रत्येकं माणिक्यसमानम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ५०-५३ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किये हुए माणिक्य को खरल में डालकर अच्छी तरह चूर्ण कर लें । अब इसमें माणिक्य समभाग (पृथक्-पृथक्) शुद्ध मैनसिल, शुद्ध हरताल, शुद्ध गन्धकचूर्ण मिलाकर निम्बू के रस से सात दिन तक मर्दन करें। जब टिकिया बनाने योग्य हो जाय तो टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें। अब इनको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस विधि को आठ बार दुहराने से माणिक्य की पाण्डुरवर्ण की भस्म हो जाती है। निम्बूरस के स्थान पर लकुच (बड़हल) स्वरस से पीसकर आठ पुट देने से भी माणिक्य की भस्म हो जाती ॥ ५०-५३ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः चूर्णीकृतं शोणरत्नं विसलैः समभागिकैः । पेषयेन्निम्बुकद्रावैर्बलिरोगशिलेङ्गुलेः ॥ ५४ ॥ विमर्द्य सुदृढे खल्वे यत्नेन सप्तवासरम् । पुटयेद्वारुणपुटे विशुष्कं कृतचक्रिकम् ॥ ५५ ॥ रीत्यानयापि पुटितमष्टवारमसंशयम् । माणिक्यमचिरादेव मृतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ५६ ॥ द्वितीयप्रकारः—तालकस्थाने हिङ्गुलक्षेपः । सर्वमन्यत्पूर्ववत् । "निम्बूरसाभ्यां वा केवलं मारितं शुभम् । गन्धहिङ्गुलनिम्बूकैर्मारितं वा भवेत् शुभम्" इत्यपि ज्ञेयम् । माणिक्यगुणा व्याख्यातप्रायाः । प्राञ्चस्तु—"माणिक्यं दीपनं वृष्यं कफवातक्षयार्त्तिनुत् । भूतवेतालपापघ्नं कर्मजव्याधिनाशनम्" इत्याहुः॥५४-५६॥ भा.टी.—शुद्ध माणिक्य चूर्ण में, माणिक्यसमभाग शुद्ध गन्धक, शुद्ध मैनसिल, तथा शुद्ध हरताल चूर्ण मिला निम्बू के रस से खूब अच्छी तरह मर्दन- कर टिकिया बनाकर सुखा लें । अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँक दें । इस विधि से आठ गजपुट देने मे शीघ्र ही माणिक्य की उत्तम भस्म बन जाती है ॥५४-५६ ॥ अथ मृतमाणिक्यस्य गुणाः माणिक्यं सुमृतं मेध्यं मधुरं तु रसायनम् । दीपनं वृष्यमायुष्यं वातपित्तहरं परम् ॥ ५७ ॥