भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१३. द्वितीयः शोधनप्रकारः अगस्त्यद्रवयोगेन यामं स्विन्नमनारतम् । दोलायन्त्रे पोट्टलीस्थं शुद्धिमायाति मौक्तिकम् ॥ ६८ ॥ जयन्तीस्वरसेनेति मौक्तिकशोधनम्—"जयन्त्या मौक्तिकं शुचि" इति स्मरणात् , अथवा अगस्त्यपत्रस्वरसेन स्वेदनात् शुद्धयति । तथा सुराप्रदीपवह्निना चूर्णोदकेन पाचितं शुद्धयति मौक्तिकम् ॥ ६८ ॥ भा.टी.—मोतियों को एक कपड़े की पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र में अगस्त्यस्वरस डालकर उसमें एक याम ( तीन घण्टे ) तक स्वेदन कर लेने से वे शुद्ध हो जाती हैं ॥ ६८ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सुराप्रदीपवह्निना शरावगं तु मौक्तिकम् ! सुधोदकेन पाचितं विशुद्धिमेत्यनुत्तमाम् ॥ ६६ ॥ भा.टी.—मोतियों को एक शराव ( चीनी के प्याले ) में रख उसमें चूने का जल डालकर इस प्याले को सुराप्रदीप की अग्नि से तीन घंटे पका लेने से भी मुक्ता शुद्ध हो जाती है ॥ ६६ ॥ मौक्तिकमारणस्य प्रथमः प्रकारः विमलं मौक्तिकं गव्यपयसा परिपेषितम् । त्रिधा लघुपुटे पक्वं मृतं स्याच्छशिसुन्दरम् ॥ ७० ॥ भा.टी.--शुद्ध की हुई मोतियों को एक उत्तम खरल में डालकर गोदुग्ध के साथ अच्छी तरह घोंटकर सुखा लें । अब इस श्वेतचूर्ण को एक सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक देवें। इस तरह तीन लघुपुट देने से मौक्तिक की चन्द्रमा के समान स्वच्छ वर्ण की भस्म हो जाती है ॥ ७० ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः मुक्ताफलन्तु तरुणीपरिस्रुतजलान्वितम् । पिष्टं त्रिवारं पुटितं मृतिमाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥ ७१ ॥ मारणप्रकारः--गोपयसा यद्वा तरुणीपरिस्रुतजलेन शतपत्रीपुष्पार्केण "अर्क गुलाब" इति प्रसिद्धेन पेषितं त्रिधा पुटितं भस्मीभवति मुक्ताफलम् ॥ ७१ ॥ भा.टी.—शुद्ध मोतियों को एक उत्तम खरल में डालकर उसमें उत्तम अर्क गुलाब डालकर खूब अच्छी तरह घोटें और सुखा लें । अब इसको सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें । इस विधि से तीन पुट देने से मोतियों की भस्म हो जाती है ॥ ७१ ॥