रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 639, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४ रसतरङ्गिणी मृतमौक्तिकस्य गुणाः मौक्तिकं वृष्यमायुष्यं मधुरं शिशिरं परम् । दीपनं दाहशमनं नेत्र्यं वर्ण्यं च कीर्तितम् ॥ ७२ ॥ जीर्णज्वरप्रशमनं त्वस्थिदन्तविवर्द्धनम् । हृद्यं मेहहरं मेध्यं दन्तोद्भेदज्वरापहम् ॥ ७३ ॥ मौक्तिकं सुशिशिरं क्षयापहं श्वासकासपरिक्षोपनाशनम् । अस्थिशोषशमनं विषापहं देहवीर्यबलवृद्धिवर्धनम् ॥ ७४ ॥ मृतञ्च मौक्तिकं सेवनतः वृष्यादिगुणम् । बालस्य दन्तोद्भेदसमये तदुपद्रव- रूपेण जातो ज्वरो दन्तोद्भेदज्वरः । स्पष्टमन्यत् । उक्तं हि—"कफपित्तास्रक्षयध्वंस कासश्वासाग्निमान्द्यजित् । पुष्टिदं वृष्यमायुष्यं दाहघ्नं मौक्तिकं मतम्" इति । भा.टी.—मुक्ता वृष्य, आयुवर्धक, मधुररस, अत्यन्त शीतवीर्य द्रव्य है । इसके सेवन से अग्नि की दीप्ति होती है, हाथ, पैरों तथा सर्वांगीण भीतरी दाह को शान्त करता है । इससे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है और त्वचा का वर्ण सुन्दर हो जाता है । मुक्तासेवन से जीर्ण ज्वर नष्ट हो जाता है, अस्थियों का पोषण और दाँत शीघ्र निकलने लगते हैं । यह हृदय के लिए उत्तम बल्य, प्रमेहहर, मेधावर्धक और दाँत निकलते समय के ज्वर को नष्ट करता है । मुक्ता शीतगुण, क्षयरोग नाशक, श्वास तथा कासरोग शामक है। इसके सेवन से अस्थिशोष नष्ट होता है, शरीरगत बाह्य विषों के प्रभाव को नष्ट करता है, शरीर में वीर्य, बल और बुद्धि की वृद्धि करता है ॥ ७२–७४ ॥ वक्तव्य—मुक्ताखटिक कार्बोनिट् ( Calciam corbonate ) होते हुए भी उसको उत्पन्न करनेवाले जीव के ऐन्द्रियक भाग की उपस्थिति से मुक्ता अन्य खटिक धातुओं में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है । मुक्ता बाह्य प्रयोग में क्षतों के लिये ग्राही और स्रावहर है । खटिकधातु क्षारीय होने के कारण आमाशय में उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकार के अम्लों को जो कि शूल और अम्लपित्त के कारण बनते हैं उदासीन कर देती है । आँतों पर इसका ग्राही प्रभाव विशेष रूप से होता है । इसी तरह शरीर के किसी मार्ग से निकलनेवाले स्राव, रक्तस्राव मलस्राव, मूत्रस्राव को यह सुखा देती है । गर्भावस्था में माता के शरीर में “विटामिन्स” की कमी को मुक्ता पूर्ण कर देती है । मुक्ता विशेषतः क्षयहर है । इसके देने से कफ की कमी के साथ रात्रिखेद और रक्तनिष्ठीवन में भी आराम आता है । इसी कारण से क्षय में मालतीवसन्त विशेष उपयोगी औषधि है ।