भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१५ मुक्ता पुट.में फूँककर भस्म बना लेने की अपेक्षा उसको शुद्ध करके गुलाब जल में २१ दिन तक खरल करके पिष्टी बनाकर प्रयोग करना अधिक गुणकारी माना जाता है। अतः इस पिष्टी का सेवन करना ही आजकल प्रचलित हो गया है। यह पिष्टी मानसिक दुर्बलता जैसे—साधारण कारण से क्रोध करना, विचारहीनता, ऊँचा शब्द सुनना, भीड़ में होने से जी घबड़ाना; इन रोगों में विशेष लाभदायक होती है। तीव्र मानसिक आघात, शराब, गाँजा, धत्तूरा आदि तीक्ष्णवीर्य, उष्ण, रूक्ष पदार्थों के अतिःसेवन से मस्तिष्क में विकृत होकर उन्मादरोग होने पर मुक्तापिष्टी उत्तम गुण करती है। रक्तपित्त, रक्ता- तिसार, रक्तप्रदर में भी इसका विशेष लाभ देखा गया है॥ ७२-७४॥ मृतमौक्तिकस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं मृतम्। मौक्तिकं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ७५ ॥ भा.टी.-मोती के भस्म को रोग, रोगी का बल तथा काल आदि अच्छी तरह विचार करके चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक मात्रा में प्रयोग किया जाता है॥ ७५॥ मृतमौक्तिकस्य आमयिकः प्रयोगः रससिन्दूरसंयुक्तं मौक्तिकं परिशीलितम् । विनिहन्त्यचिरादेव दन्तोद्भेदभवं ज्वरम् ॥ ७६ ॥ मृतविद्रुमगन्धेशसंयुक्तं मृतमौक्तिकम् । बीजपूराम्भसा पिष्टं पक्वं लघुपुटे ततः॥ ७७ ॥ भक्षितं सततञ्चैतद् गुञ्जाद्वितयसंमितम् । मासमात्रप्रयोगेण निहन्ति क्षयमुल्बणम् ॥ ७८ ॥ मृतविद्रुमसंयुक्तं मौक्तिक परिशीलितम् । हन्ति फुप्फुसदौर्बल्यं चिरकालसमुद्भवम् ॥ ७६ ॥ कटुकीगैरिकोपेतं सुमृतं मौक्तिकेयकम्। निषेवितं निहन्त्याशु हिक्काः परमदारुणाः ॥ ८० ॥ स्वर्णाक्कैकान्तभसितसमेत खलु मौक्तिकम् । बीजपूरस्य तोयेन हिक्कां जयति दारुणाम् ॥ ८१ ॥ रोगयोग्यः प्रयोगोऽस्य रससिन्दूरेति—स्वर्णम्, अर्कः ताम्रम्, कान्तं कान्त- लोहं, तेषां भस्मानि, तैः समेतम्। निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ७६-८१ ॥