भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५१६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—बच्चों के दाँत निकलते समय होनेवाले ज्वर में मुक्ताभस्म को रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारद, प्रत्येक समभाग मिलाकर अर्थात् पारद गन्धक की कजली कर उसमें मुक्ता आदि मिलाकर इसको बिजौरानींबू के स्वरस से मर्दन कर लघुपुट में फूँक देवें। अब इस औषधि में से दो रत्ती की मात्रा लेकर निरन्तर एक मास तक सेवन कराने से भयंकररूपयुक्त राजयक्ष्मा में आराम आता है। फेफड़ों की पुरानी दुर्बलता में मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। भयंकर हिचकी की बीमारी में मुक्ता को कुटकी तथा स्वर्णगैरिकचूर्ण के साथ सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। इसी तरह मुक्ताभस्म में स्वर्णभस्म, ताम्रभस्म तथा कान्तलोहभस्म मिलाकर बिजौरानींबूरस के साथ सेवन करने से दारुण हिचकी में आराम आता है ॥ ७६–८१ ॥ अथ मुक्तापञ्चामृतरसायनम् मौक्तिकं विद्रुमं वङ्गं शङ्खं मुक्तागृहं तथा । वसुदेवाब्धिचन्द्रेन्दुभागिकं क्रमशः पृथक् ॥८२॥ वरीविदारीकन्येक्षुदुग्धहंसपदीरसैः । पृथक् सम्पेष्य यत्नेन पञ्चधा पुटपाचितम् ॥८३॥ ततः काचपिधानेन विदध्यात्कूपिकागतम् । रसायनमिदं ख्यातं मुक्तापञ्चामृताह्वयम् ॥८४॥ अनारतं द्विगुञ्जन्तु गव्यदुग्धेन शीलितम् । मासद्वयप्रयोगेण रसायनफलप्रदम् ॥८५॥ जीर्णज्वरं महाघोरं राजयक्ष्माणमुल्बणम् । निहन्ति सर्वरोगांश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥८६॥ मुक्तापञ्चामृतरसायनम्—मुक्तागृहं मुक्ताशुक्तिः । मौक्तिकं अष्टभागम् , विद्रुमं चतुर्भागम्, वङ्गं द्विभागम्, शङ्खमेकभागम्, मुक्ताशुक्तिमप्येकभागम् । वरी शतावरी, कन्या घृतकुमारी । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ८२–८६ ॥ भा.टी.—मुक्ताभस्म आठ भाग, प्रवालभस्म चार भाग, वङ्गभस्म दो भाग शङ्खभस्म एक भाग, शुक्तिभस्म एक भाग, लेकर सबको एकत्र खरल में डाल- कर इसको अलग-अलग शतावरीस्वरस, विदारीकन्दस्वरस, घीकुंआरस्वरस, गन्ने का रस, दूध तथा हंसपदी के स्वरस में घोट सुखाकर पाँच लघुपुट देवें। अन्तमें इसको सम्पुट में से निकाल एक काँच की शीशी में भरकर डाट लगाकर रखलें।