रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
५१६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—बच्चों के दाँत निकलते समय होनेवाले ज्वर में मुक्ताभस्म को रससिन्दूर के साथ मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म, शुद्ध गन्धक, शुद्ध पारद, प्रत्येक समभाग मिलाकर अर्थात् पारद गन्धक की कजली कर उसमें मुक्ता आदि मिलाकर इसको बिजौरानींबू के स्वरस से मर्दन कर लघुपुट में फूँक देवें। अब इस औषधि में से दो रत्ती की मात्रा लेकर निरन्तर एक मास तक सेवन कराने से भयंकररूपयुक्त राजयक्ष्मा में आराम आता है। फेफड़ों की पुरानी दुर्बलता में मुक्ताभस्म में प्रवालभस्म मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। भयंकर हिचकी की बीमारी में मुक्ता को कुटकी तथा स्वर्णगैरिकचूर्ण के साथ सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। इसी तरह मुक्ताभस्म में स्वर्णभस्म, ताम्रभस्म तथा कान्तलोहभस्म मिलाकर बिजौरानींबूरस के साथ सेवन करने से दारुण हिचकी में आराम आता है ॥ ७६–८१ ॥ अथ मुक्तापञ्चामृतरसायनम् मौक्तिकं विद्रुमं वङ्गं शङ्खं मुक्तागृहं तथा । वसुदेवाब्धिचन्द्रेन्दुभागिकं क्रमशः पृथक् ॥८२॥ वरीविदारीकन्येक्षुदुग्धहंसपदीरसैः । पृथक् सम्पेष्य यत्नेन पञ्चधा पुटपाचितम् ॥८३॥ ततः काचपिधानेन विदध्यात्कूपिकागतम् । रसायनमिदं ख्यातं मुक्तापञ्चामृताह्वयम् ॥८४॥ अनारतं द्विगुञ्जन्तु गव्यदुग्धेन शीलितम् । मासद्वयप्रयोगेण रसायनफलप्रदम् ॥८५॥ जीर्णज्वरं महाघोरं राजयक्ष्माणमुल्बणम् । निहन्ति सर्वरोगांश्च तत्तद्रोगानुपानतः ॥८६॥ मुक्तापञ्चामृतरसायनम्—मुक्तागृहं मुक्ताशुक्तिः । मौक्तिकं अष्टभागम् , विद्रुमं चतुर्भागम्, वङ्गं द्विभागम्, शङ्खमेकभागम्, मुक्ताशुक्तिमप्येकभागम् । वरी शतावरी, कन्या घृतकुमारी । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥ ८२–८६ ॥ भा.टी.—मुक्ताभस्म आठ भाग, प्रवालभस्म चार भाग, वङ्गभस्म दो भाग शङ्खभस्म एक भाग, शुक्तिभस्म एक भाग, लेकर सबको एकत्र खरल में डाल- कर इसको अलग-अलग शतावरीस्वरस, विदारीकन्दस्वरस, घीकुंआरस्वरस, गन्ने का रस, दूध तथा हंसपदी के स्वरस में घोट सुखाकर पाँच लघुपुट देवें। अन्तमें इसको सम्पुट में से निकाल एक काँच की शीशी में भरकर डाट लगाकर रखलें।
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१७ इसको मुक्तापञ्चामृत रसायन कहते हैं । इसमें से प्रतिदिन निरन्तर दो मास तक गोदुग्ध के साथ सेवन करने से जरा व्याधि का नाश होता है । इसके सेवन से भयंकर जीर्णज्वर तथा तीव्र अवस्था का राजयक्ष्मा रोग नष्ट हो जाता है । इस तरह तत्तत् रोगहर द्रव्यों के अनुपान से यह रसायन सब रोगों में लाभ पहुँचाता है ॥ ८२–८६ ॥ अथ पुष्परागस्य नामानि पुष्पराजः पुष्परागः पीतरक्ताह्वयस्तथा । गुरुरत्नं पीतमणिः स एव गुरुवल्लभः ॥ ८७ ॥ भा.टी.—पुष्पराज, पुष्पराग, पीतरक्त, गुरु ( बृहस्पति ) रत्न, पीतमणि तथा गुरुवल्लभ, ये सब नाम पुखराजमणि के कहे जाते हैं ॥ ८७ ॥ जात्यपुष्पराजस्य लक्षणम् स्निग्धं समं सुमस्सृणं तु सुवर्णवर्णं स्वच्छं परं सुविमलं तु सुवृत्तगात्रम् । यत्कर्णिकारकुसुमप्रभमुज्ज्वलञ्च जात्यं तदेव गदितं खलु पुष्पराजम् ॥ ८८ ॥ निकषोपलसंघृष्टं वर्णं पुष्णाति यन्निजम् । पुष्पराजन्तु तज्जात्यं मतं रत्नपरीक्षकैः ॥ ८९ ॥ अथ पुष्परागपरिचयः—स्निग्धं समं सुमस्सृणमिति ग्राह्यपुष्परागरूपम् । उक्तं हि—"पुष्परागं गुरु स्निग्धं स्वच्छं स्थूलं समं मृदु । कर्णिकारप्रसूनाभं मसृणं शुभमष्टधा" इति । तथा च "घृष्टो निकषपदे यत् पुष्यति यो रागमधिकमात्मी- यम् । एष खलु पुष्परागो जात्यस्तथाऽयं परीक्षकैरुक्तः" इति । श्यामलादिरूपं च तत् त्याज्यम् । "कृष्णबिन्द्वङ्कितं द्वयक्षं धवलं मलिनं लघु । विच्छायं शर्करां- गाभं पुष्परागं सदोषकम्" इति स्मरणात् ॥ ८८, ८९ ॥ भा.टी.—उत्तम पुखराजमणि स्पर्श में चिकनी, समगात्र, चमकीली, स्वर्ण वर्ण की स्वच्छ, गोलाकर और देखने में अमलतास के फूल की सी आभावाली होती है । यदि इसको कसौटी पर घिसा जाय तो इसका वर्ण और भी साफ दिखाई देने लगता है । इस परीक्षा में ठीक उतरनेवाली पुखराजमणि को ही रत्नपरीक्षकों ने उत्तम माना है ॥ ८८, ८९ ॥ हेयपुष्पराजस्य लक्षणम् श्यामलं निष्प्रभं कर्कशं द्वयक्षकं कृष्णबिन्द्वङ्कितं शर्कराङ्गप्रभम् । उन्नतं त्वानतं यच्च रूक्षंपरं पुष्पराजं मतं तत्तु हेयं बुधैः ॥ ९० ॥
६१८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो पुखराज श्यामलवर्ण, प्रभारहित, स्पर्शरहित, स्पर्श में कठोर, दो नेत्रों के से चिह्नोंवाला अथवा छोटे-छोटे काले बिन्दुओं से युक्त, बालू के पिण्ड जैसा, कहीं ऊँचा, कहीं पर गहरा और रूक्ष ( खुश्क ) हो, उसे त्याज्य समझना चाहिएं ॥ ६० ॥ पुष्पराजस्य शोधनम् कुलत्थक्वथितोपेतेः काञ्जिकैः स्वेदितं समम् । दोलायन्त्रे पुष्पराजं यामैकेन विशुद्ध्यति ॥ ६१ ॥ शोधनम्—कुलत्थकथितजलेन काञ्जिकेन च स्वेदनादस्य शुद्धिः—“पुष्प- रागञ्च संधानैः कुलत्थक्वाथसंयुक्तैः” इति वचनात् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में समभाग कुलत्थक्वाथ और काञ्जी डालकर उसमें तीन घण्टे तक पुखराज को स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ ६१ ॥ पुष्पराजस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतिर्यत्नतः । मारयेत्पुष्पराजन्तु रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ६२ ॥ भा.टी.—पूर्व कथित माणिक्यमणि का दो प्रकार की मारण विधियों से पुखराज की भस्म हो जाती है । अर्थात् पुखराज की भस्म विधि भी माणि- क्यमणि के सदृश ही समझनी चाहिए ॥ ६२ ॥ पुष्पराजस्य गुणाः पुष्पराजन्तु शिशिरं दीपनं पाचनं परम् । कफवातप्रशमनं कुष्ठच्छर्दिनिबर्हणम् ॥ ६३ ॥ विषघ्नं दाहशमनं गुदजामयनाशनम् । मेध्यं बृंहणमायुष्यं रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥ भा.टी.—पुखराज शीत गुण द्रव्य है । इसके भस्म के सेवन से दीपन और पाचन क्रियायें बढ़ने लगती हैं । इसके प्रयोग से कफ वात का प्रकोप शान्त हो जाता है । यह कुष्ठ तथा वमन को नष्ट करती है, शरीरगत विष- प्रभाव को नष्ट करती है, दाह को शान्त करती तथा बवासीर में लाभ पहुँचाती है । स्वस्थ शरीर में इसका प्रयोग करने से इसके द्वारा मेधा वृद्धि, शरीर में मांस वृद्धि तथा आयु वृद्धि होती है ॥ ६३, ६४ ॥ पुष्पराजस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् ।
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६१६ सुमृतं पुष्पराजन्तु प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥ ६५ ॥ भा.टी.-पुखराजभस्म की मात्रा चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक पूर्ण मात्रा में सेवन की जा सकती है ॥ ६५ ॥ अथ नीलस्य नामानि नीलो नीलोपलो नीलं नीलरत्नं सुनीलकम् । महानीलञ्च नीलाश्मशनिरत्नञ्च कीर्तितम् ॥ ६६ ॥ अथ नीलस्य परिचयः—ग्राह्यनीलस्वरूपं सरलात्तरम् । वचनं हि—"एक च्छायं गुरु स्निग्धं स्वच्छं पिण्डितविग्रहम् । मृदु मध्ये लसज्ज्योतिः सप्तधा नील- मुत्तमम्” इति ॥ ६६ ॥ भा.टी.--नील, नीलोपल, नीलरत्न, सुनीलक, महानील, नीलाश्म तथा शनिरत्न ये सब नाम नीलम के कहे जाते हैं ॥ ६६ ॥ जात्यनीलस्य लक्षणम् स्वच्छं सच्छायममलं मसृणं तु महोज्ज्वलम् । स्निग्धं गुरु लसज्ज्योतिर्जात्यं नीलं मतं बुधैः ॥ ६७ ॥ भा.टी.—उत्तम नीलम मणि, स्वच्छ तथा सुन्दर कान्तियुक्त, कुछ-कुछ पारदर्शक, चिकनी और पर्याप्त चमकीली, गुरुभार तथा ज्योतियुक्त नील वर्ण की होती है ॥ ६७ ॥ हेयनीलस्य लक्षणम् रक्ताद्धं विगतच्छायं रूक्षं लघु च कोमलम् । परिहेयं शौरिरत्नं मतं रत्नपरीक्षकैः ॥ ६८ ॥ भा.टी.—आधे भाग में रक्तवर्ण और आधे भाग में नीलवर्ण की अपार- दर्शक, रूक्ष, लघुभार, कोमल (दबाव डालने पर मुड़नेवाली अथवा शीघ्र टूटनेवाली) नीलम त्याज्य समझनी चाहिए ॥ ६८ ॥ अथ नीलस्य शोधनम् नीलीस्वरससंयुक्तं दोलायन्त्रे विधानतः । यामैकं परिपक्तन्तु नीलं शुद्ध्यति निश्चितम् ॥ ६९ ॥ भा.टी.—नीलमणि को दोलायंत्र में नील का स्वरस डालकर उसमें एक पहर तक स्वेदन करके शुद्ध कर लेना चाहिए ॥ ६९ ॥ अथ नीलस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः ।
६२० रसतरङ्गिणी मारयेच्छनिरत्नं तु रसागमविशारदः ॥ १०० ॥ नीलीस्वरसेन स्वेदनादस्य शुद्धिः—“नीलं नीलीरसेन च” इति स्मरणात्। माणिक्यवच्चास्य मारणमिति ॥ १०० ॥ भा.टी.—नीलम मणि की भस्म पूर्वोक्त माणिक्य मणि की भस्म विधि के अनुसार ही की जाती है ॥ १०० ॥ मृतनीलस्य गुणाः नीलं तु सुमृतं वृष्यं बल्यं दीपनमुत्तमम् । त्रिदोषशमनं वर्ण्यं गुदजामयनाशनम् ॥ १०१ ॥ त्वच्यं कुष्ठादिदोषघ्नं श्वासकासनिषूदनम् । कफपित्तानिलहरं बिषमज्वरनाशनम् ॥ १०२ ॥ मृतनीलगुणाः—सुगमः । निगदन्ति हि—“श्वासकासहरं वृष्यं त्रिदोषघ्नं सुदीपनम् । विषमज्वरनियमनं पापघ्नं नीलमीरितम्” इति ॥ १०१, १०२ ॥ भा.टी.—उत्तम नीलभस्म वृष्य, बलवर्धक, दीपन, त्रिदोष प्रकोप शामक, त्वचा के लिए वर्ण्य तथा बवासीर रोग नाशक होती है । इसके सेवन से कुष्ठ आदि विकृतियाँ दूर होकर त्वचा का सुन्दर वर्ण निखर आता है । इसके सेवन से श्वासकास रोग में लाभ पहुँचता है । यह भस्म कफ, पित्त तथा वातहर और विष नाशक है ॥ १०१, १०२ ॥ मृतनीलस्य मात्रा गुञ्जाष्टमांशप्रमितात् गुञ्जार्द्धप्रमितं परम् । सुमृतं नीलरत्नं तु प्राणाचार्यः प्रयोजयेत् ॥ १०३ ॥ भा.टी.—नील भस्म को आवश्यकतानुसार ⅛ रत्ती (दो चावल भर) से लेकर ½ रत्ती (चार चावल भर) तक की मात्रा में प्रयोग किया जाता है ॥ १०३ ॥ अथ मरकतस्य नामानि गारुत्मत मरकतं तार्क्ष्यं गारुडसंज्ञकम् । बुधरत्नं रौहिणेयं हरिद्रत्नञ्च तन्मतम् ॥ १०४ ॥ भा.टी.—गारुत्मत, मरकत, तार्क्ष्य, गारुडमणि, बुधरत्न, रौहिणेय, हरि- द्रत्न, ये सब नाम मरकत (पन्ना) के कहे जाते हैं ॥ १०४ ॥ जात्यमरकतस्य स्वरूपम् सच्छायं मसृणं स्वच्छं गुरु स्निग्धञ्च कोमलम् । अष्टाश्रञ्च हरिद्वर्णं जात्यं मरकतं मतम् ॥ १०५ ॥
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२१ मरकतस्य परिचयः—जात्यमरकतरूपं सच्छायमित्यादिना अव्यंगांमेति अविकृतांगम्। उक्तञ्च—“हरिद्वर्णं गुरु स्निग्धं स्फुरद्रश्मिचयं शुभम्। मसृणं भासुरं तार्क्ष्यं गात्रं सप्तगुणं मतम्” इति ॥ १०५ ॥ भा.टी.—उत्तम कान्तियुक्त, चमकीला, स्वच्छ, गुरुभार, चिकना, कोमल- स्पर्श, सम और सुन्दर आकार तथा हरे रंग की मरकत मणि उत्तम मानी जाती है ॥ १०५ ॥ हेयमरकतस्य स्वरूपम् रूक्षन्तु विगतच्छायं विकृताङ्गं खरं लघु । सत्रासं चातिमलिनं हेयं मरकतं मतम् ॥ १०६ ॥ त्याज्यन्तु रूक्षमित्यादिना स्फुटम् ॥ १०६ ॥ भा.टी.—रूक्ष, तथा कान्ति रहित, विकृत आकार (शरीर), खुरदरा, लघुभार, देखने में कुछ भयावना सा, अपारदर्शक मलिन मरकतमणि त्याज्य मानी जाती है ॥ १०६ ॥ अथ मरकतस्य शोधनम् सुरभीपयसा यामं दोलायन्त्रे विधानतः । विपाचितं मरकतं विशुद्ध्यति सुनिश्चितम् ॥ १०७ ॥ एतस्य शोधनञ्च गोदुग्धेन स्वेदनात् सिद्ध्यति, “तार्क्ष्यं गोदुग्धकैस्तथा” इति स्मरणात् ॥ १०७ ॥ भा.टी.—मरकत मणि को दोलायन्त्र में गोदुग्ध डालकर उसमें तीन घंटे पका लेने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ १०७ ॥ अथ मरकतस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । अष्टधा पुटितं तार्थ्यं म्रियतेऽत्र न संशयः ॥ १०८ ॥ मरकतमारणञ्च माणिक्यवत् ॥ १०८ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त माणिक्यमणि की मारण (भस्म) विधियों में से किसी के द्वारा आठ बार पुट देने से मरकतमणि की उत्तम भस्म हो जाती है ॥१०८॥ मरकतस्य गुणाः मृतं मरकतं बल्यं विषघ्नं वह्निदीपनम् । ओजोविवर्द्धनं वृष्यं पाण्डुशोफनिषूदनम् ॥ १०६ ॥ श्वासच्छर्दिप्रशमनं गुदजामयनाशनम् । समाख्यातं विशेषेण सन्निपातनिबर्हणम् ॥ ११० ॥
६२२ रसततरङ्गिणी मरकतगुणाः बल्यविषघ्नत्वादयः । आहुश्च प्राज्ञाः - "ज्वरच्छर्दिविषश्वास- संन्निपाताग्निमान्द्यनुत् । दुर्नामपाण्डुशोफघ्नं तार्क्ष्यमोजोविवर्धनम्" इति। १०६,११० भा.टी.- मरकत मणि की भस्म, बलवर्धक, शरीरगत विष नाशक, अग्नि (पाचकाग्नि) दीपक, ओज वर्धक, उत्पादक अंगों के लिए बल्य, पाण्डुरोग तथा शोथरोग नाशक होती है । इसके सेवन से श्वास रोग, वमन तथा बवासीर रोग में लाभ होता है । तीव्र सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब हृदय दुर्बल हो गया हो, ज्ञान शक्ति क्षीण हो गयी हो और रोगी मृत्यु-मुख में जाने लगा हो तो मरकत मणि की भस्म रोगी को जीवन प्रदान करती है ॥ १०६, ११० ॥ अथ मरकतस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् । मृतं मरकतं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥ १११ ॥ भा.टी.- रोग तथा रोगी का बल काल देश अवस्था आदि का विचार करके चौथाई रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में मरकतमणि भस्म का प्रयोग किया जा सकता है ॥ १११ ॥ अथ वैदूर्यस्य नामानि विदूररत्नं वैदूर्यं केतुरत्नं विद्रूरजम् । बिडालाख्यं विडालाक्षं वायजञ्च प्रकीर्तितम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.-विदूररत्न, वैदूर्य, केतुरत्न, विद्रूरज, बिडालाख्य, बिडालाक्ष, वायज ये सब नाम वैदूर्य ( लसुनिया Cats Eye ) के कहे जाते हैं ॥ ११२ ॥ जात्यवैदूर्यस्य स्वरूपम् वैदूर्यं गुरु सुस्निग्धं बिडालेक्षणसप्रभम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयाढ्यं वैदूर्यं जात्यमुच्यते ॥ ११३ ॥ अथ वैदूर्यपरिचयः-गुरुसुस्निग्धमिति उत्कृष्टं वैदूर्यरूपम् । उक्तं हि- "वैदूर्य श्यामशुभ्रामं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभ- मीरितम्" इति ॥ ११३ ॥ भा.टी.- उत्तम वैदूर्यमणि गुरुभार, अत्यन्त चिकना स्पर्श, बिल्ली के नेत्र के समान चमकीला होता है । इस पर शुभ्रवर्ण का एक घेरा या यज्ञोपवीत जैसा चिह्न पड़ा हुआ होता है ॥ ११३ ॥ हेयवैदूर्यस्य स्वरूपम् विच्छायं लघु रूक्षञ्च सत्रासं चिपिटं खरम् । कृष्णां तथा मृच्छिलाढ्यं वैदूर्यं हेयमीरितम् ॥ ११४ ॥
त्रयोविंशस्तरङ्गः ५२३ भा.टी.—कान्ति रहित, लघुभार, रूक्ष ( खुश्क ),देखने में भयावह (डरा- वना-सा),चपटा आकार, खुरदरा, कृष्णवर्ण तथा मिट्टी और पत्थर के छोटे-छोटे खण्डों से युक्त, वैदूर्य अग्राह्य समझना चाहिए ॥ १२४ ॥ वैदूर्यस्य शोधनम् त्रिफलाक्वथितोपेतं वैदूर्यं याममात्रकम् । दोलायन्त्रे परिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११५ ॥ वैदूर्य्यशोधनं त्रिफलाक्वाथेन साध्यम् । स्मरन्ति हि—"वैदूर्यं त्रिफलाजलैः" इति ॥ ११५ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में त्रिफला क्वाथ भरकर उसमें वैदूर्यमणि को तीन घण्टे तक पकाने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११५ ॥ वैदूर्यस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । विदूररत्नं पुटितं त्वष्टधा मृतिमाप्नुयात् ॥ ११६ ॥ भा.टी.—माणिक्य मणि की पूर्वोक्त मारण विधियों से ही आठ बार वैदूर्य मणि को पुट दी जाय तो उसकी उत्तम भस्म हो जाती है ॥ ११६ ॥ मृतवैदूर्यस्य गुणाः सुमृतं खलु वैदूर्यं मधुरं शिशिरं परम् । दीपनं मेध्यमायुष्यं बल्यं च मलभेदनम् ॥ ११७ ॥ रक्तपित्तप्रशमनं चक्षुष्यं बृंहणं परम् ॥ पित्तामयप्रशमनं समाख्यातं विशेषतः ॥ ११८ ॥ वैदूर्य्यगुणाः—मधुरं शिशिरं परमित्यादिना । वदन्ति हि—वैदूर्यं रक्तपित्त- घ्नं प्रजायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं वृष्यमेव च" इति ॥११७,११८॥ भा.टी.—उत्तम वैदूर्य भस्म, मधुररस और अत्यन्त शीत गुणयुक्त होती है । यह पाचक अग्नि को उत्तेजित करती और धारणा शक्ति को बढ़ाती है । स्वस्थशरीर में इसके सेवन से आयु की वृद्धि होती है और शरीर में बल बढ़ता है । इसके सेवन से मल पतला होकर निकलता है। यह भस्म रक्तपित्त शामक, नेत्रों के लिए लाभदायक और शरीर को मोटा करनेवाली होती है क्योंकि यह शीत वीर्य और मधुररस द्रव्य है, अतः विशेष रूप से पित्तरोग शामक मानी जाती है ॥ ११७, ११८ ॥
६२४ रसतरङ्गिणी वैदूर्यस्य मात्रा वस्र्वंशतो रक्तिकाया वैदूर्य गुञ्जसंमितम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ११६ ॥ भा.टी.-रोग तथा रोगी, बल, अवस्था, देश, काल आदिका पूर्ण विचार करके वैदूर्यमणि भस्म को ⅛ रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं ॥ ११६ ॥ अथ गोमेदकस्य नामानि गोमेदकश्च गोमेदः पिङ्गास्फटिक इत्यपि । गोमेदो राहुरत्नञ्च कीर्तितश्च तमोमणिः ॥ १२० ॥ भा.टी.-गोमेदक, गोमेद, पिङ्गास्फटिक, राहुरत्न तथा तमोमणि, ये सब नाम गोमेदमणि ( Sunstone ) के कहे जाते हैं ॥ १२० ॥ जात्यगोमेदस्य स्वरूपम् गोमूत्राभं स्निग्धममन्दं समगात्रं हेमारक्तं निर्दल मच्छं गुरुभारम् । दीप्तच्छायं मञ्जुलरूपं मसृणं यद् गोमेदाख्यं रत्नमिह स्यात्तज्जात्यम् ॥ १२१ ॥ गोमेदकपरिचयः-गोमूत्राभमिति तद्ग्राह्यरूपम् । हेमारक्तं स्वर्णवदीषदू रक्तम् । उक्तम्-''सुस्वच्छगोजलच्छायं स्निग्धं स्वच्छं समं गुरु । निर्दलं मसृणं दीप्तं गोमेदं शुभमष्टधा'' इति ॥ १२१ ॥ भा.टी.-उत्तम गोमेदमणि गोमूत्र की सी आभावाली, चिकना स्पर्श, समभागयुक्त शरीर-अर्थात् दाग, गढ़ा, कहीं चपटा, मोटापन रहित, स्वर्ण के समान कुछ रक्तवर्णयुक्त, चमकीली, सुन्दराकार, पालिश की हुई सी चमक- वाली होती है ॥ १२१ ॥ हेयगोमेदस्य स्वरूपम् सत्रासं विगतच्छायं चिपिटं मलिनप्रभम् । सदलं लघु रूक्षं च गोमेदं हेयमीरितम् ॥ १२२ ॥ सत्रासमिति त्याज्यगोमेदरूपम् । तथाहि-''विच्छायं लघु रूक्षांगं चिपिटं पटलाचितम् । निष्प्रभं पीतकाचाभं गोमेदं न शुभावहम्'' ॥ १२२ ॥ भा.टी.-अग्राह्य गोमेद त्रास युक्त (असुन्दर अनाकर्षक होने से कुछ भय सा उत्पन्न करनेवाला ) कान्ति रहित, चिपटे आकार का, मैली चमक से युक्त,
४० त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२५ पत्रों से युक्त, लघुभार, और रूक्ष ( खुश्क ) होता है ॥ १२२ ॥ गोमेदस्य शोधनम् निम्बूकरससेनेह दोलायन्त्रे विधानतः । परिस्विन्नं तु यामैकं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १२३ ॥ गोमेदशोधनं निम्बूकरसेन सम्यक्स्वेदनात् सम्पाद्यते ॥ १२३ ॥ भा.टी.—गोमेदमणि को दोलायन्त्र में नीम्बू का स्वरस भरकर उसमें तीन घंटे तक अच्छी तरह स्वेदन करने से यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है ॥१२३॥ गोमेदकस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । अष्टवारं सुपुटितं गोमेदं मृतिमाप्नुयात् ॥ १२४ ॥ माणिक्यवदेवास्यापि मारणम् ॥ १२४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त माणिक्यमणि की भस्म विधियों में से किसी एक विधि से आठ पुट देने से गोमेद की भस्म हो जाती है ॥ १२४ ॥ मृतगोमेदस्य गुणाः गोमेदकं रुचिकरं दीपनं पाचनं परम् । त्वग्दोषशमनं बल्यं कफपित्तप्रणाशनम् ॥ १२५ ॥ उष्णं पाण्ड्वामयहरं क्षयक्षयकरं परम् । समाख्यातं विशेषेण बुद्धिसंबर्द्धनं तथा ॥ १२६ ॥ गुणास्तु रुचिकरत्वादयः पृथग्विधाः । उक्तं हि—"गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षय- पाण्डुक्षयङ्करम्। दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम्।" इति ॥ १२५, १२६ ॥ भा.टी.—गोमेद भस्म भोजन में रुचिकारक, पाचकाग्नि की शक्ति को बढ़ानेवाली और आमरस को पाचन करती है । इसको कुछ दिन सेवन करने से त्वचा की खराबी (फोड़ा फुन्सी आदि) दूर हो जाती है। शरीर में बल बढ़ता है और कफ तथा पित्त का प्रकोप शांत हो जाता है । यह भस्म उष्णगुण होती है, पांडुरोग तथा क्षयरोग को नष्ट करने में उत्तम गुण रखती है । इसके सेवन से वातिक संस्थान तथा मस्तिष्क का पोषण होने से बुद्धि, विचार, ध्यान, अन्वेषण आदि शक्ति की वृद्धि होती है ॥ १२५, १२६ ॥ मृतगोमेदस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं मृतम् । गोमेदं तु प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १२७ ॥
६२६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल, काल आदि का विचार करके गोमेद भस्म की चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा तक में सेवन करना चाहिए ॥ १२७ ॥ अथ प्रवालस्य नामानि प्रवालकं प्रवालश्च भौमरत्नञ्च विद्रुमम् । अब्धिजन्तुविशेषोत्थं तदेव परिकीर्तितम् ॥ १२८ ॥ भा.टी.—प्रवालक, प्रवाल, भौमरत्न, विद्रुम, अब्धिजन्तुविशेषोत्थ, ये सब नाम प्रवाल मूंगा (Red Coral Bead) के कहे जाते हैं ॥ १२८ ॥ ग्राह्यविद्रुमस्य स्वरूपम् आरक्तमञ्जुलच्छायं स्निग्धं वृत्तञ्च निर्व्रणम् । दीर्घंस्थूलं गुरु दृढं ग्राह्यं विद्रुममुच्यते ॥ १२६ ॥ अथ विद्रुमपरिचयः—आरक्तमञ्जुलच्छायमिति ग्राह्यप्रवालरूपम् । उक्तं हि “पक्वबिम्बफलच्छायं वृत्तायतमवक्रकम् । स्निग्धमव्रणकं स्थूलं प्रवालं सप्तधा शुभम्” इति ॥ ११६ ॥ भा.टी.—गूढ रक्तवर्ण की कान्तिवाला अर्थात् रक्तवर्णकी, स्निग्ध और गोलाकार; लम्बी मोटी शाखायुक्त, व्रण ( गढा छिद्र ) रहित, गुरुभार तथा दृढ़ ( मजबूत ) प्रवाल उत्तम ( ग्राह्य ) माना जाता है ॥ १२६ ॥ वक्तव्य—आजकल प्रवाल के दो भाग प्रयोग में लाये जा रहे हैं १— शाखा प्रवाल । २—प्रवाल । शाखा प्रवाल ही उत्तम प्रवाल मानी जाती है । यह लम्बी-लम्बी शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होती है, इसके बीच में कोई छिद्र नहीं होता है । तोड़ने में बहुत मजबूत और भीतर से भी बाह्य रंग से युक्त होती है । कई माला बेचनेवाले मूंगा की माला कह करके भी मूंगा बेचा करते हैं, परन्तु कई बार यह कृत्रिम मसाले का मूंगा पाया गया है। इन दोनों को जलती हुई आग में जलायें तो ये बत्ती की भाँति जलने लगते हैं । अतः यदि माला- वाली मूंगा लेना हो तो उसे तोड़कर और आग में जलाकर परीक्षा कर लेनी चाहिए । मूलप्रवाल प्रायः अनेक गोल-गोल छिद्रयुक्त स्पञ्ज की भाँति का पत्थर सा होता है । इसके छिद्रों में मिट्टी, कङ्कड़, बालू-रेत भरी हुई होती है। यह मूल- प्रवाल शाखाप्रवाल की अपेक्षा अल्पगुण और अधिक क्षारीय होता है। रसरत्न- समुच्चय में उत्तम शाखाप्रवाल की इस प्रकार परीक्षा लिखी है—“पक्वबिम्बी- फलच्छायं वृत्तायतमवक्रकम् । स्निग्धमव्रणकं स्थूलं प्रवालं सप्तधा शुभम्” ॥
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२७ हेयविद्रुमस्य लक्षणम् पाण्डुरं सब्रणं रूक्षं सशिरं लघु धूसरम् । कृष्णं सूक्ष्मं सुमसृणं हेयं विद्रुममीरितम् ॥ १३० ॥ त्याज्यविद्रुमं पाण्डुरादिरूपम् ॥ १३० ॥ भा.टी.—जो प्रवाल पाण्डुरवर्ण, व्रण युक्त, रूक्ष (खुश्क) और छोटी- छोटी शिराओं जैसी लम्बी-लम्बी लकीरों से युक्त, लघुभार, धूसरवर्ण, काले रंग की पतली-पतली शाखाओंवाली, अत्यधिक चमकीली होती है, उसे औषधि कर्म में ग्राह्य नहीं समझना चाहिए ॥ १३० ॥ विद्रुमस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जयन्त्याः स्वरसेनेह दोलायन्त्रे तु विद्रुमम् । यामैकं सुपरिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३१ ॥ जयन्तीरसेन विद्रुमशोधनम् । यामैकमित्यत्रात्यन्तसंयोगे द्वितीया ॥१३१॥ भा.टी—उत्तम शाखाप्रवाल को दोलायन्त्र में डालकर उसमें जयन्ती (अरणी) का स्वरस अथवा क्वाथ भर दें। अब इसको चूल्हे में रखकर तीन घंटे तक उबाल लें, तो प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३१ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सर्जिकाक्षारसंयुक्ते सलिले परिपाचितम् । यामैकेन प्रवालं तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३२ ॥ यद्वा सर्जिकाक्षारवारिणा स्विन्नं शुद्ध्यति, “विद्रुमं क्षारवर्गेणे” तिवचनात् ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में सज्जीखार का जल भरकर उसमें मूंगा डालकर तीन घंटे तक उबाल लेने से भी प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३२ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः तण्डुलीयद्रवेणेह दोलायन्त्रे तु यामकम् । प्रवालकं परिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३३ ॥ तथा तण्डुलीयद्रवेणापि शुद्ध्यति । तन्त्रान्तरेऽपि तथा स्मरणात् ॥१३३॥ भा.टी.—प्रवाल को दोलायन्त्र में डालकर उसमें चौलाई का स्वरस भर दें और तीन घंटे तक अग्नि में पकायें तो प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३३॥ अथ विद्रुमस्य प्रथमो मारणप्रकारः विशोधितं विद्रुमं तु श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत् । कन्याम्भसाऽथ सम्पेष्य शोषयेत् कृतचक्रिकम् ॥ १३४ ॥
६२८ रसतरङ्गिणी सम्पुटस्थं ततः कृत्वा त्रिवारं पुटयेद्भिषक् । एवं पुटत्रयैर्भस्म जायते शशिसुन्दरम् ॥ १३५ ॥ विद्रुममारणं कुमारीरसेन त्रिधा पुटनात् । एवं गोदुग्धेन जयन्तीरसेन शता- वरीरसेनापि पृथक्पुटनात् मृतिरस्य जायते । उपलक्षणाच्चैतत् निम्बूदकादिभिरपि पुटनात् म्रियते ॥ १३४, १३५ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवाल की शाखाओं को पहिले इमामदस्ते या लोह के खरल में खूब कूटकर चूर्ण करलें । अब इस चूर्ण को साफ खरल में डाल घीकुआर के रस से खूब मर्दन करें, जब टिकिया बनाने योग्य हो जाय तो टिकिया बना- कर धूप में सुखालें और सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें । इस प्रकार तीन बार कुमारीस्वरस से पुट देने से प्रवाल की चन्द्रमा के समान स्वच्छ और श्वेत भस्म हो जाती है ॥ १३४, १३५ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विद्रुमं गव्यदुग्धेन सम्पेष्य कृतचक्रिकम् । म्रियते पुटितं भस्म जायतेऽतिमनोहरम् ॥ १३६ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवालचूर्ण को खरल में गोदुग्ध के साथ मर्दन करके टिकिया बना लें । इन टिकियाओं को धूप में अच्छी तरह सुखा सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस प्रकार दो तीन पुट देने से प्रवाल की सुन्दर भस्म बन जाती है ॥ १३६ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः जयन्त्याः स्वरसेनेह सम्पेष्य कृतचक्रिकम् । त्रिवारं पुटितं सम्यग् विद्रुमं म्रियते ध्रुवम् ॥ १३७ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवालचूर्ण को जयन्ती (अरणी) के स्वरस के साथ मर्दनकर टिकियाओं को संपुट में बन्दकर पुट में तीन बार फूँक देने से भी प्रवाल की उत्तम भस्म बन जाती है ॥ १३७ ॥ वक्तव्य—मुक्तापिष्टी की भाँति प्रवालपिष्टी का प्रयोग भी आजकल वैद्यों में बहुत प्रचलित हो गया है । परन्तु इसके बनाने में पर्याप्त मर्दन की आव- श्यकता होती है । अनुभव से प्रवालपिष्टी बनाने की यह विधि सर्वोत्तम रहती है कि पहिले प्रवाल को गोदुग्ध की एक गजपुट देकर भस्म करलें । अब इस भस्म को गुलाबजल की इक्कीस भावना देकर सुखालें । इस विधि से प्रवाल- भस्म पर्याप्त हृद्य, शीतगुण तथा लघु बन जाती है ।
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२४ चतुर्थो मारणप्रकारः पिष्टं वरीरसेनेह प्रवालं कृतचक्रिकम् । म्रियते पुटितं वह्नौ भस्म स्यात् सुमनोहरम् ॥ १३८ ॥ भा.टी.—शतावर के रस में प्रवाल को मर्दन कर टिकिया बनाकर धूप में सुखा सम्पुट में बन्द कर फूँक देने से प्रवाल की सुन्दर भस्म बन जाती है। १३८ अथ विद्रुमस्य गुणाः विद्रुमं सुमृतं क्षारं मधुरं लघु शीतलम् । दीपनं पाचनं चैव दृष्टिरोगनिषूदनम् ॥ १३६ ॥ त्रिदोषशमनं बल्यं विशेषात्कफवातनुत् । क्षयकासहरं चैव रक्तपित्तप्रणाशनम् ॥ १४० ॥ स्वेदातिनिर्गमहरं रात्रिस्वेदहरं परम् । विषघ्नं भूतशमनं वीर्यवर्णविवर्धनम् ॥ १४१ ॥ विद्रुमगुणाः—सुमृतं प्रवालं रसतः क्षारं मधुरं च, लघु पाकतः, शीतलं वीर्यतः, दीपनमुदराऽग्नेः, आमस्य पाचनम्, नेत्रामयनाशनमिति । दृष्टिरोगास्ति- मिरादयः, तेषां नाशनम् । त्रिदोषशमनं सामान्यतः, विशेषात् कफवातनुत् । क्षयोत्थः कासः क्षयकासः, तं हरतीति अथवा क्षयहरः कासहरश्च । स्वेदातिनि- र्गमहरं सामान्यतः, विशेषात् रात्रिस्वेदहरं परम् । भूताः जीवाणवः, तेषां शम- नम् । वीर्यं वर्णञ्च विवर्धयतीति ॥ १३६-१४१ ॥ भा.टी.—यह भस्म क्षार-मधुररस, लघु, शीतल, दीपन, पाचनगुणयुक्त होती है। शरीर में षड्धातु की कमी के कारण होनेवाले तिमिर आदि दृष्टिरोगों को नष्ट करती है। यह त्रिदोषप्रकोप शामक, विशेष रूप से कफ-वातप्रकोप शामक, क्षयकासहर, रक्तपित्तशामक होती है । इसके सेवन से अधिक पसीने का निकलना तथा राजयक्ष्मा में रात्रि को स्वेद का निकलना बन्द हो जाता है। यह शरीर गत विषप्रभाव को नष्ट करती है और जीवाणुनाशक है । स्वस्थ शरीर में सेवन करने से वीर्य, शक्ति तथा त्वचा के वर्ण की उत्कृष्टता को बढ़ा देती है ॥ १३६-१४१ ॥ वक्तव्य—अनुभव से देखा जाता है कि उत्तम प्रवालभस्म, क्षय की सभी अवस्थाओं में अत्यन्त लाभदायक है । भस्म की अपेक्षा पिष्टी विशेष गुणकारक होती है । वह भी पहिले लिखा गया है । जहाँ कहीं मन्दज्वर के साथ शुष्क साधारण कास आदि लक्षणों से क्षय की आशंका हो अथवा ज्वर आदि कोई चिह्न न होते हुए भी शरीर दिन प्रतिदिन क्षीणता की ओर जा रहा हो और
६३० रसतन्त्रसार शारीरिक भार कम हो रहा हो तो प्रवालपिष्टी से शीघ्र लाभ दिखाई देता है । ज्वर की अधिकता और निरन्तरता, शुष्ककास, श्वास, पार्श्वशूल (फुप्फुस व्यथा) आदि लक्षणयुक्त यक्ष्मा में प्रवालपिष्टी को शृंगभस्म तथा सतगिलोय के साथ देने से अच्छा लाभ होता है । परन्तु सब लक्षण युक्त यक्ष्मा, तीव्रज्वर, तीव्र- कास, रक्तनिष्ठीवन, दुर्गन्धित कफनिष्ठीवन, सर्वांग स्वेद, प्रातःकालीन स्वेद, तृषा, ओजोनाश, अति क्षीणता आदि में प्रवाल को सुवर्णभस्म और गुडूचीसत्व के साथ देना लाभदायक होता है रक्त की द्रवता और वृद्धि में प्रवाल शीघ्र गुण करता है । अतएव इसे तीव्र रक्तार्श, रक्तपित्त (नकसीर आदि) Haemo- philia रोगों में इसके प्रयोग से रक्त में घनत्व बढ़ जाता है । वह पुष्ट भी हो जाता है । गर्भावस्था में होनेवाले पाण्डु तथा अन्यान्य रोगों में प्रायः प्रवालपिष्टी बहुत उत्तम लाभदायक है । जिन माताओं की सन्तान सूखोरोगग्रस्त होकर मर जाया करती है उसको गर्भावस्था में प्रवाल का सेवन कराना अत्यन्त लाभदा- यक सिद्ध हुआ है । जिन स्त्रियों में दूध पिलाने के कारण दुर्बलता अधिक बढ़ जाती है उनके लिए प्रवाल उत्तम औषधि है । जिन बालकों की गलग्रन्थि (Toncile) बढ़ जाती है और कान पकते रहते हैं और सदा प्रतिश्याय बना रहता है उनके लिए भी प्रवाल ग्राही और पोषक होने से लाभदायक सिद्ध हुआ है। मृतविद्रुमस्य मात्रा गुञ्जार्धतः समारभ्य गुंजाद्वयमितं परम् । विद्रुमं विनियुंजीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १४२ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल, अवस्था तथा काल आदि पूर्ण विचार करके आधी रत्ती से लेकर दो रत्ती की मात्रा तक प्रवालभस्म का प्रयोग करना चाहिए ॥ १४२ ॥ अथ विद्रुमस्य आमयिकः प्रयोगः तण्डुलोदकयोगेन प्रवालं रक्तिकाद्वयम् । शीलितं विनिहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रं कफोत्थितम् ॥ १४३ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं प्रवालं गुञ्जसंमितम् । कट्वीद्राक्षाभयायुक्तं विड्विघातं निहन्त्यलम् ॥१४४॥ प्रवालं सुमृतं गुञ्जं रससिन्दूरसंयुतम् । गोक्षुरस्य कषायेण शीलितं मूत्रसादहृत् ॥ १४५ ॥
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६३१ द्विरक्तिकं तु सुमृतं विद्रुमं मधुसंयुतम् । शीलितं नाशयेत्याशु निशास्वेदमशेषतः ॥ १४६ ॥ विद्रुमं रससिन्दूरसंयुक्तं परिशीलितम् । पुनर्नवागोक्षुराभ्यां शोथं नाशयति ध्रुवम् ॥ १४७ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं विद्रुमं परिशीलितम् । वरीक्षुरकषायेण मूत्रकृच्छ्रं व्यपोहति ॥ १४८ ॥ समयशदसमेतं माक्षितं भौमरत्नं विमलमधुविमिश्रं शीलितं तु त्रिमासम् । करयुगलसमुत्थां स्वेदसंस्त्रावबाधा- मपहरति नितान्तं वै बहूत्थानजाताम् ॥ १४९ ॥ अभ्रवाशीरजोयुक्तं विद्रुमं परिशीलितम् । विनिहन्ति विशेषेण कासं क्षयसमुत्थितम् ॥ १५० ॥ विश्वाभ्ररससिन्दूरव्याघ्रीयुक्तं तु विद्रुमम् । मधुना सेवितं हन्ति शिशूनां कासमुल्बणम् ॥ १५१ ॥ अभ्रकट्फलसिन्दूरभार्गीयुक्तं तु विद्रुमम् । शिशूनां सञ्चरं श्वासं नाशयत्याशु निश्चितम् ॥ १५२ ॥ शुक्तिकारसिन्दूरतुगाक्षीरीसमन्वितम् । विद्रुमं शीलितं श्वासं कासञ्च विनिहन्त्यलम् ॥ १५३ ॥ विद्रुमस्य रोगयोग्यः प्रयोगः, कट्वी कटुकी । विड्विघातम् विबन्धभेदम् । वांशी वंशरोचना । वरीक्षुरकषायेणेति शतावरीगोक्षुरयोः कषायेण । बहूत्थान- जातमिति बहुभिर्हेतुभिर्जाताम् । उपलक्षणाञ्चैतत् “विद्रुमं गव्यपयसा यथाविधि निषेवितम् । निहन्ति क्षवथुं शीघ्रं तथा शीर्षव्यथामपि” इत्यपि ज्ञेयम् ॥१४३-१५३॥ भा.टी.—कफप्रकोपजन्य मूत्रकृच्छ्र में दो रत्ती प्रवालभस्म को चावलों के धोवन के साथ देने से शीघ्र आराम आता है । आँतों की प्रेरक शक्ति के दुर्बल पड़ जाने से होनेवाले विड्विघात (मलवन्ध भेद) में प्रवालभस्म १ रत्ती, रस- सिन्दूर एक रत्ती को कटुकी चूर्ण ४ रत्ती, द्राक्षा आठ-दस (संख्या में) तथा हरीतकी चूर्ण एक मासा के साथ गोली बनाकर गरम जल या दूध के साथ सेवन से आराम आता है । मूत्रसाद रोग में एक रत्ती प्रवालभस्म या पिष्टी को समभाग रससिन्दूर में मिलाकर गोखरू कषाय के साथ देने से लाभ होता है । रात्रि में- अधिक पसीना आने पर दो रत्ती प्रवालभस्म को मधु में मिलाकर दिन में दो तीन बार सेवन करने से शीघ्र आराम आता है । शोथ रोग में प्रवालभस्म में
६३२ रसतरङ्गिणी रससिन्दूर मिलाकर इसको पुनर्नवा और गोखरू के कपाय के साथ सेवन कराना चाहिए। साधारण मूत्रकृच्छ्र में प्रवालभस्म या पिष्टी को शतावर और तालमखाने के कषाय के साथ सेवन कराने से लाभ होता है। हाथों की हथेलियों तथा शरीर के अन्य किसी स्थान से स्वेद निकलने पर प्रवालभस्म को यशदभस्म में मिला कर उत्तम मधु के साथ निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से अवश्य आराम आता है। क्षयरोग की खाँसी में प्रवालभस्म को अभ्रकभस्म तथा वंशलोचनचूर्ण के साथ मिला वासा-स्वरस अथवा बनप्सा कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र लाभ दिखाई देता है। छोटे-छोटे-बालकों की तेज खाँसी में प्रवालभस्म सोंठ- चूर्ण, अभ्रकभस्म, रससिन्दूर तथा कण्टकारीचूर्ण में मिलाकर शहद के साथ चटाने से बहुत लाभ होता है। बालकों के ज्वर, कास तथा श्वास अर्थात् ब्रांको- निमोनिया में प्रवालभस्म को अभ्रकभस्म, कायफलचूर्ण, रससिन्दूर तथा भारंगी- चूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है। श्वास तथा कास में प्रवालभस्म को शुक्तिभस्म, रससिन्दूर, एवं वंशलोचनचूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है ॥ १४३-१५३ ॥ अथ क्षुद्ररत्नगणः वैक्रान्तं सूर्यकान्तश्च चन्द्रकान्तो नृपोपलः । पेरोजकश्च स्फटिकं क्षुद्ररत्नगणो ह्ययम् ॥ १५४ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त, सूर्यकान्त, चन्द्रकान्त, नृपोपल (राजावर्त) पिरोज और स्फटिक; इनको (सामान्य) रत्न (मणि) कहा जाता है ॥ १५४ ॥ अथ वैक्रान्तस्य नामानि वैक्रान्तश्चैव विक्रान्तं वैक्रान्तं जीर्णवज्रकम् । कुवज्रं क्षुद्रकुलिशं चूर्णवज्रञ्च तन्मतम् ॥ १५५ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त, विक्रान्त, जीर्णवज्रक, कुवज्रक, क्षुद्रकुलिश और चूर्ण- वज्र, ये सब नाम वैक्रान्त के कहे जाते हैं ॥ १५५ ॥ वक्तव्य—वैक्रान्त भी आयुर्वेद के खनिज सन्दिग्ध द्रव्यों में एक द्रव्य है। इसके नाम पर अनेक भिन्न-भिन्न द्रव्य लेने के लिए रसशास्त्रियों का मत- भेद है। पूर्वाचार्यों ने वैक्रान्त का प्रयोग हीरे के स्थान पर लिखा है। अतः यह द्रव्य हीरे का सादृश्य कुछ न कुछ अवश्य रखता है। अन्यत्र 'वैक्रान्तं दग्धहीरकम्' ऐसा लिखा हुआ भी मिलता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६३३ वैक्रान्त भी उन्हीं अवस्थाओं में और उसी वस्तु से बनता है जिससे कि हीरा। परन्तु हीरे के समान पूर्ण ताप तथा भार में प्राप्त न होने से (पृथ्वी के अन्तराल में) यह (वैक्रान्त) अर्धपक्व या दग्धावस्था में ही रह जाता है। अतः इसे दग्ध- हीरक के नाम से लिखा है। परन्तु यह कुछ भ्रमपूर्ण निर्णय है, क्योंकि हीरा कोयला (Carbon) से बनता है और उसमें कार्बन की अधिकता पायी जाती है, परन्तु वैक्रान्त के निर्माण में कार्बन निश्चित नहीं होता है। इस बात को देखकर कई नवीन अन्वेषकों के विचार में यह बात आ रही है कि अठपहलू—अष्टकोण या षट् पहलू—षट्कोण और चमक-दमक प्रभा, वर्ण कठोरता, उत्ताप सहन- शीलता आदि गुणधर्मों को देखते हुए वैक्रान्त “बिल्लौर पत्थर” है। क्योंकि बिल्लौर वैक्रान्त की उत्पत्ति करनेवाले स्थानों में पाया जाता है। और आजकल भी कहीं-कहीं विन्ध्य की पर्वत माला में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। और मौक्तिक गुण भी बिल्लौर के वज्र (हीरा) अथवा वैक्रान्तवत् ही हैं। बिल्लौर भी वज्रवत् कठोर ताप से पैदा होता है और कठोरता में हीरकवत् ही है। अतः बिल्लौर हीरे से बहुत कुछ सादृश्य रखता है। बिल्लौर में भी हीरे की सी काँच और कठोर धातुओं को काटने की शक्ति मानी जाती है। अतएव सम्भवतः “विक्रान्तयति लौहानि तेन वैक्रान्तकः स्मृतः” ऐसा पाया जाता है। बिल्लौर भी हीरकवत् पारदर्शक होता है। परन्तु कई रसशास्त्रियों के विचार में तुरमली वैक्रान्त है और यही विचार आजकल दृढ़ होता जा रहा है। परन्तु वर्तमान में प्राप्त होनेवाली तुरमली प्रायः कणरूप, भंगुर, साधारण कठोर, अग्निसहन शक्तियुक्त तथा उसमें खरोंचने से उसमें चिह्न पड़ जाते हैं। अतः उत्तम जातीय तुरमली वैक्रान्त हो सकती है। इसका अन्तिम निर्णय अभी विद्वानों के हाथ में है। वैक्रान्त आजकल अफ्रीका से विशेष रूप में पाया जाता है। वैक्रान्तस्य निर्वचनम् वज्रवत् सर्वरोगाणां हरणाय यतस्त्रिदम् । धत्ते विक्रान्तिमतुलां वैक्रान्तं कथ्यते ततः ॥१५६॥ वैक्रान्तपरिचयः—वज्रवत् सर्वरोगहरणायातुलां विक्रान्तिं धत्ते यतस्तस्मात् वैक्रान्तमिति निर्वचनम् ॥१५६॥ भा.टी.—क्योंकि यह वैक्रान्त सब रोगों को नष्ट करने की अनुपम शक्ति रखता है, अतः इसको “वैक्रान्त” शब्द से कहा जाता है ॥१५६॥
६३४ रसतरङ्गिणी ग्राह्यवैक्रान्तस्य स्वरूपम् अष्टास्रमष्टफलकं सितपीतासितारुणम् । मसृणं गुरु षट्कोणं वैक्रान्तं जात्यमुच्यते ॥१५७॥ श्वेतो नीलस्तथा रक्तः पीतः पारावतप्रभः । तार्क्ष्यभः कर्बुरः कृष्णो वर्णतश्चाष्टधा हि सः ॥१५८॥ अष्टास्रमिति ग्राह्यवैक्रान्तरूपम् । "वैक्रान्तः श्वेतपीतादिभेदादष्टप्रकारकः। स्वर्णरूप्यादिकरणे स्वस्ववर्णाः शुभो मतः । वैक्रान्तः कृष्णवर्णो यः षट्कोणो वसुकोणकः । मसृणो गुरुतायुक्तो निर्मलः सर्वसिद्धिदः" इति च प्राहुः प्राञ्चः ॥१५७, १५८॥ भा.टी.—जिस वैक्रान्त के खण्ड अष्टकोण और आठपहलवाले, श्वेतवर्ण, पीतवर्ण, कृष्णवर्ण अथवा रक्तवर्ण के चिकने-चमकीले, गुरु भार हों अथवा षट्कोण छः पहलवाले हों, उसे उत्तम वैक्रान्त कहा जाता है । वर्णभेद से वैक्रान्त आठ प्रकार का माना जाता है । १—श्वेतवर्ण, २—नीलवर्ण, ३— रक्तवर्ण, ४—पीतवर्ण, ५—पारावतप्रभ ( कबूतर के से वर्ण का ), ६— तार्क्ष्यभ ( गरुड़वर्ण या मरकतमणि वर्ण ), ७—कर्बुरवर्ण ( काला साँवला- वर्ण मिश्रित ), ८—कृष्ण ( काला ) वर्ण का होता है ॥१५७, १५८॥ वैक्रान्तशोधनस्य प्रथमः प्रकारः वैक्रान्तं पोट्टलीसंस्थं पटुक्षारसमन्वितम् । अम्लेन केनचिद्वापि कोद्रवक्वथितेन वा ॥१५६॥ गोमूत्रेणाथवा कामं प्रखरानलयोगतः । दोलायन्त्रे परिस्विन्नः शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१६०॥ वैक्रान्तशोधनप्रकारः—पटु लवणम् । क्षारः यवक्षारः स्वर्जिका वा । स्वेद- नाद् निम्बूकादीनामम्लानां स्वरसकोद्रवक्वाथः गोमूत्रं कुलत्थक्वाथो वा ग्राह्यः ॥१५६, १६०॥ भा.टी.—वैक्रान्त के खण्डों को एक स्वच्छ कपड़े की पोटली में सैन्धा- नमक तथा सज्जीखार या जवाखार सहित बाँधकर इस पोटली को दोलायन्त्र में किसी अम्लद्रव कांजी या नींबू स्वरस को भरकर अथवा कोदों का क्वाथ अथवा गोमूत्र भरकर उसमें तीव्र अग्नि से स्वेदन ( पकाना ) करने पर वैक्रान्त अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥१५६, १६०॥
त्रयोविंशस्तरङ्गः ६३५ द्वितीयः शोधनप्रकारः वैक्रान्तः सपटुक्षारः कुलत्थक्वाथयोगतः । दोलायन्त्रे परिस्विन्नः शुद्धिमाप्नोति यामतः ॥ १६१ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त के खण्डों को सैन्धानमक और यवक्षार सहित एक कपड़े की पोटली बाँधकर दोलायन्त्र में कुलत्थ क्वाथ भर उसमें तीन घंटे तक तीव्र अग्नि से स्वेदन करने पर वह शुद्ध हो जाता है ॥ १६१ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वैक्रान्तं पोट्लीसंस्र्थं कदलीकन्दजद्रवे । दोलायन्त्रे परिस्विन्नं यामैकेन विशुद्ध्यति ॥ १६२ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त को एक कपड़े की पोटली में बाँधकर उसको कदली (केला) कन्दस्वरस में दोलायन्त्र द्वारा तीन घंटे तक पकाने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १६२ ॥ वैक्रान्तस्य प्रथमो मारणप्रकारः विमलबलिविमिश्रं चूर्णंवज्रस्य चूर्णं समदरदसमेतं निम्बुनीरेण पिष्टम् । द्विरदपुटसमाख्ये तत् पुटे सम्पुटस्थं वसुमितपुटपक्वं पञ्चतां याति नूनम् ॥ १६३ ॥ वैक्रान्तमारणम्—समगन्धकहिङ्गुलाभ्यामष्टपुटैः सम्पाद्यम् ॥ १६३ ॥ भा.टी.-शुद्ध वैक्रान्त चूर्ण में समभाग शुद्ध हिंगुल और शुद्ध गन्धक पृथक्-पृथक् मिलाकर नींबू स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । सूखने के बाद अच्छी तरह सम्पुट में बन्द करके इसको गजपुट में फूँक देवें । स्वांगशीत होने पर चूर्ण को निकाल फिर उसमें समभाग शुद्धपारद और गन्धक मिला नींबू के रस से मर्दन कर सुखा के फिर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस विधि को आठ बार दुहराने से अवश्य ही वैक्रान्त की भस्म हो जाती है ॥ १६३ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विशोधितं तु वैक्रान्तं यत्नतश्चूर्णंयेद्भिषक् । त्रिगुणं गन्धपाषाणं समं चैव रसेश्वरम् ॥ १६४ ॥ दत्त्वा निम्बूकतोयेन पेषयेद् याममात्रकम् । सुशुष्कं सम्पुटे न्यस्य पुटेद् गजपुटेन वै ॥ १६५ ॥