रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२५ पत्रों से युक्त, लघुभार, और रूक्ष ( खुश्क ) होता है ॥ १२२ ॥ गोमेदस्य शोधनम् निम्बूकरससेनेह दोलायन्त्रे विधानतः । परिस्विन्नं तु यामैकं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १२३ ॥ गोमेदशोधनं निम्बूकरसेन सम्यक्स्वेदनात् सम्पाद्यते ॥ १२३ ॥ भा.टी.—गोमेदमणि को दोलायन्त्र में नीम्बू का स्वरस भरकर उसमें तीन घंटे तक अच्छी तरह स्वेदन करने से यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है ॥१२३॥ गोमेदकस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । अष्टवारं सुपुटितं गोमेदं मृतिमाप्नुयात् ॥ १२४ ॥ माणिक्यवदेवास्यापि मारणम् ॥ १२४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त माणिक्यमणि की भस्म विधियों में से किसी एक विधि से आठ पुट देने से गोमेद की भस्म हो जाती है ॥ १२४ ॥ मृतगोमेदस्य गुणाः गोमेदकं रुचिकरं दीपनं पाचनं परम् । त्वग्दोषशमनं बल्यं कफपित्तप्रणाशनम् ॥ १२५ ॥ उष्णं पाण्ड्वामयहरं क्षयक्षयकरं परम् । समाख्यातं विशेषेण बुद्धिसंबर्द्धनं तथा ॥ १२६ ॥ गुणास्तु रुचिकरत्वादयः पृथग्विधाः । उक्तं हि—"गोमेदं कफपित्तघ्नं क्षय- पाण्डुक्षयङ्करम्। दीपनं पाचनं रुच्यं त्वच्यं बुद्धिप्रबोधनम्।" इति ॥ १२५, १२६ ॥ भा.टी.—गोमेद भस्म भोजन में रुचिकारक, पाचकाग्नि की शक्ति को बढ़ानेवाली और आमरस को पाचन करती है । इसको कुछ दिन सेवन करने से त्वचा की खराबी (फोड़ा फुन्सी आदि) दूर हो जाती है। शरीर में बल बढ़ता है और कफ तथा पित्त का प्रकोप शांत हो जाता है । यह भस्म उष्णगुण होती है, पांडुरोग तथा क्षयरोग को नष्ट करने में उत्तम गुण रखती है । इसके सेवन से वातिक संस्थान तथा मस्तिष्क का पोषण होने से बुद्धि, विचार, ध्यान, अन्वेषण आदि शक्ति की वृद्धि होती है ॥ १२५, १२६ ॥ मृतगोमेदस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं मृतम् । गोमेदं तु प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १२७ ॥