रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६२७ हेयविद्रुमस्य लक्षणम् पाण्डुरं सब्रणं रूक्षं सशिरं लघु धूसरम् । कृष्णं सूक्ष्मं सुमसृणं हेयं विद्रुममीरितम् ॥ १३० ॥ त्याज्यविद्रुमं पाण्डुरादिरूपम् ॥ १३० ॥ भा.टी.—जो प्रवाल पाण्डुरवर्ण, व्रण युक्त, रूक्ष (खुश्क) और छोटी- छोटी शिराओं जैसी लम्बी-लम्बी लकीरों से युक्त, लघुभार, धूसरवर्ण, काले रंग की पतली-पतली शाखाओंवाली, अत्यधिक चमकीली होती है, उसे औषधि कर्म में ग्राह्य नहीं समझना चाहिए ॥ १३० ॥ विद्रुमस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जयन्त्याः स्वरसेनेह दोलायन्त्रे तु विद्रुमम् । यामैकं सुपरिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३१ ॥ जयन्तीरसेन विद्रुमशोधनम् । यामैकमित्यत्रात्यन्तसंयोगे द्वितीया ॥१३१॥ भा.टी—उत्तम शाखाप्रवाल को दोलायन्त्र में डालकर उसमें जयन्ती (अरणी) का स्वरस अथवा क्वाथ भर दें। अब इसको चूल्हे में रखकर तीन घंटे तक उबाल लें, तो प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३१ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सर्जिकाक्षारसंयुक्ते सलिले परिपाचितम् । यामैकेन प्रवालं तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३२ ॥ यद्वा सर्जिकाक्षारवारिणा स्विन्नं शुद्ध्यति, “विद्रुमं क्षारवर्गेणे” तिवचनात् ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में सज्जीखार का जल भरकर उसमें मूंगा डालकर तीन घंटे तक उबाल लेने से भी प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३२ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः तण्डुलीयद्रवेणेह दोलायन्त्रे तु यामकम् । प्रवालकं परिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १३३ ॥ तथा तण्डुलीयद्रवेणापि शुद्ध्यति । तन्त्रान्तरेऽपि तथा स्मरणात् ॥१३३॥ भा.टी.—प्रवाल को दोलायन्त्र में डालकर उसमें चौलाई का स्वरस भर दें और तीन घंटे तक अग्नि में पकायें तो प्रवाल शुद्ध हो जाता है ॥ १३३॥ अथ विद्रुमस्य प्रथमो मारणप्रकारः विशोधितं विद्रुमं तु श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत् । कन्याम्भसाऽथ सम्पेष्य शोषयेत् कृतचक्रिकम् ॥ १३४ ॥