रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२८ रसतरङ्गिणी सम्पुटस्थं ततः कृत्वा त्रिवारं पुटयेद्भिषक् । एवं पुटत्रयैर्भस्म जायते शशिसुन्दरम् ॥ १३५ ॥ विद्रुममारणं कुमारीरसेन त्रिधा पुटनात् । एवं गोदुग्धेन जयन्तीरसेन शता- वरीरसेनापि पृथक्पुटनात् मृतिरस्य जायते । उपलक्षणाच्चैतत् निम्बूदकादिभिरपि पुटनात् म्रियते ॥ १३४, १३५ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवाल की शाखाओं को पहिले इमामदस्ते या लोह के खरल में खूब कूटकर चूर्ण करलें । अब इस चूर्ण को साफ खरल में डाल घीकुआर के रस से खूब मर्दन करें, जब टिकिया बनाने योग्य हो जाय तो टिकिया बना- कर धूप में सुखालें और सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक देवें । इस प्रकार तीन बार कुमारीस्वरस से पुट देने से प्रवाल की चन्द्रमा के समान स्वच्छ और श्वेत भस्म हो जाती है ॥ १३४, १३५ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विद्रुमं गव्यदुग्धेन सम्पेष्य कृतचक्रिकम् । म्रियते पुटितं भस्म जायतेऽतिमनोहरम् ॥ १३६ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवालचूर्ण को खरल में गोदुग्ध के साथ मर्दन करके टिकिया बना लें । इन टिकियाओं को धूप में अच्छी तरह सुखा सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस प्रकार दो तीन पुट देने से प्रवाल की सुन्दर भस्म बन जाती है ॥ १३६ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः जयन्त्याः स्वरसेनेह सम्पेष्य कृतचक्रिकम् । त्रिवारं पुटितं सम्यग् विद्रुमं म्रियते ध्रुवम् ॥ १३७ ॥ आ.टी.—शुद्ध प्रवालचूर्ण को जयन्ती (अरणी) के स्वरस के साथ मर्दनकर टिकियाओं को संपुट में बन्दकर पुट में तीन बार फूँक देने से भी प्रवाल की उत्तम भस्म बन जाती है ॥ १३७ ॥ वक्तव्य—मुक्तापिष्टी की भाँति प्रवालपिष्टी का प्रयोग भी आजकल वैद्यों में बहुत प्रचलित हो गया है । परन्तु इसके बनाने में पर्याप्त मर्दन की आव- श्यकता होती है । अनुभव से प्रवालपिष्टी बनाने की यह विधि सर्वोत्तम रहती है कि पहिले प्रवाल को गोदुग्ध की एक गजपुट देकर भस्म करलें । अब इस भस्म को गुलाबजल की इक्कीस भावना देकर सुखालें । इस विधि से प्रवाल- भस्म पर्याप्त हृद्य, शीतगुण तथा लघु बन जाती है ।