भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६२४ चतुर्थो मारणप्रकारः पिष्टं वरीरसेनेह प्रवालं कृतचक्रिकम् । म्रियते पुटितं वह्नौ भस्म स्यात् सुमनोहरम् ॥ १३८ ॥ भा.टी.—शतावर के रस में प्रवाल को मर्दन कर टिकिया बनाकर धूप में सुखा सम्पुट में बन्द कर फूँक देने से प्रवाल की सुन्दर भस्म बन जाती है। १३८ अथ विद्रुमस्य गुणाः विद्रुमं सुमृतं क्षारं मधुरं लघु शीतलम् । दीपनं पाचनं चैव दृष्टिरोगनिषूदनम् ॥ १३६ ॥ त्रिदोषशमनं बल्यं विशेषात्कफवातनुत् । क्षयकासहरं चैव रक्तपित्तप्रणाशनम् ॥ १४० ॥ स्वेदातिनिर्गमहरं रात्रिस्वेदहरं परम् । विषघ्नं भूतशमनं वीर्यवर्णविवर्धनम् ॥ १४१ ॥ विद्रुमगुणाः—सुमृतं प्रवालं रसतः क्षारं मधुरं च, लघु पाकतः, शीतलं वीर्यतः, दीपनमुदराऽग्नेः, आमस्य पाचनम्, नेत्रामयनाशनमिति । दृष्टिरोगास्ति- मिरादयः, तेषां नाशनम् । त्रिदोषशमनं सामान्यतः, विशेषात् कफवातनुत् । क्षयोत्थः कासः क्षयकासः, तं हरतीति अथवा क्षयहरः कासहरश्च । स्वेदातिनि- र्गमहरं सामान्यतः, विशेषात् रात्रिस्वेदहरं परम् । भूताः जीवाणवः, तेषां शम- नम् । वीर्यं वर्णञ्च विवर्धयतीति ॥ १३६-१४१ ॥ भा.टी.—यह भस्म क्षार-मधुररस, लघु, शीतल, दीपन, पाचनगुणयुक्त होती है। शरीर में षड्धातु की कमी के कारण होनेवाले तिमिर आदि दृष्टिरोगों को नष्ट करती है। यह त्रिदोषप्रकोप शामक, विशेष रूप से कफ-वातप्रकोप शामक, क्षयकासहर, रक्तपित्तशामक होती है । इसके सेवन से अधिक पसीने का निकलना तथा राजयक्ष्मा में रात्रि को स्वेद का निकलना बन्द हो जाता है। यह शरीर गत विषप्रभाव को नष्ट करती है और जीवाणुनाशक है । स्वस्थ शरीर में सेवन करने से वीर्य, शक्ति तथा त्वचा के वर्ण की उत्कृष्टता को बढ़ा देती है ॥ १३६-१४१ ॥ वक्तव्य—अनुभव से देखा जाता है कि उत्तम प्रवालभस्म, क्षय की सभी अवस्थाओं में अत्यन्त लाभदायक है । भस्म की अपेक्षा पिष्टी विशेष गुणकारक होती है । वह भी पहिले लिखा गया है । जहाँ कहीं मन्दज्वर के साथ शुष्क साधारण कास आदि लक्षणों से क्षय की आशंका हो अथवा ज्वर आदि कोई चिह्न न होते हुए भी शरीर दिन प्रतिदिन क्षीणता की ओर जा रहा हो और