भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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६२२ रसततरङ्गिणी मरकतगुणाः बल्यविषघ्नत्वादयः । आहुश्च प्राज्ञाः - "ज्वरच्छर्दिविषश्वास- संन्निपाताग्निमान्द्यनुत् । दुर्नामपाण्डुशोफघ्नं तार्क्ष्यमोजोविवर्धनम्" इति। १०६,११० भा.टी.- मरकत मणि की भस्म, बलवर्धक, शरीरगत विष नाशक, अग्नि (पाचकाग्नि) दीपक, ओज वर्धक, उत्पादक अंगों के लिए बल्य, पाण्डुरोग तथा शोथरोग नाशक होती है । इसके सेवन से श्वास रोग, वमन तथा बवासीर रोग में लाभ होता है । तीव्र सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब हृदय दुर्बल हो गया हो, ज्ञान शक्ति क्षीण हो गयी हो और रोगी मृत्यु-मुख में जाने लगा हो तो मरकत मणि की भस्म रोगी को जीवन प्रदान करती है ॥ १०६, ११० ॥ अथ मरकतस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् । मृतं मरकतं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥ १११ ॥ भा.टी.- रोग तथा रोगी का बल काल देश अवस्था आदि का विचार करके चौथाई रत्ती से एक रत्ती तक की मात्रा में मरकतमणि भस्म का प्रयोग किया जा सकता है ॥ १११ ॥ अथ वैदूर्यस्य नामानि विदूररत्नं वैदूर्यं केतुरत्नं विद्रूरजम् । बिडालाख्यं विडालाक्षं वायजञ्च प्रकीर्तितम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.-विदूररत्न, वैदूर्य, केतुरत्न, विद्रूरज, बिडालाख्य, बिडालाक्ष, वायज ये सब नाम वैदूर्य ( लसुनिया Cats Eye ) के कहे जाते हैं ॥ ११२ ॥ जात्यवैदूर्यस्य स्वरूपम् वैदूर्यं गुरु सुस्निग्धं बिडालेक्षणसप्रभम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयाढ्यं वैदूर्यं जात्यमुच्यते ॥ ११३ ॥ अथ वैदूर्यपरिचयः-गुरुसुस्निग्धमिति उत्कृष्टं वैदूर्यरूपम् । उक्तं हि- "वैदूर्य श्यामशुभ्रामं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । भ्रमच्छुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभ- मीरितम्" इति ॥ ११३ ॥ भा.टी.- उत्तम वैदूर्यमणि गुरुभार, अत्यन्त चिकना स्पर्श, बिल्ली के नेत्र के समान चमकीला होता है । इस पर शुभ्रवर्ण का एक घेरा या यज्ञोपवीत जैसा चिह्न पड़ा हुआ होता है ॥ ११३ ॥ हेयवैदूर्यस्य स्वरूपम् विच्छायं लघु रूक्षञ्च सत्रासं चिपिटं खरम् । कृष्णां तथा मृच्छिलाढ्यं वैदूर्यं हेयमीरितम् ॥ ११४ ॥

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