रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 648, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ५२३ भा.टी.—कान्ति रहित, लघुभार, रूक्ष ( खुश्क ),देखने में भयावह (डरा- वना-सा),चपटा आकार, खुरदरा, कृष्णवर्ण तथा मिट्टी और पत्थर के छोटे-छोटे खण्डों से युक्त, वैदूर्य अग्राह्य समझना चाहिए ॥ १२४ ॥ वैदूर्यस्य शोधनम् त्रिफलाक्वथितोपेतं वैदूर्यं याममात्रकम् । दोलायन्त्रे परिस्विन्नं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११५ ॥ वैदूर्य्यशोधनं त्रिफलाक्वाथेन साध्यम् । स्मरन्ति हि—"वैदूर्यं त्रिफलाजलैः" इति ॥ ११५ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में त्रिफला क्वाथ भरकर उसमें वैदूर्यमणि को तीन घण्टे तक पकाने से वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥ ११५ ॥ वैदूर्यस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतियत्नतः । विदूररत्नं पुटितं त्वष्टधा मृतिमाप्नुयात् ॥ ११६ ॥ भा.टी.—माणिक्य मणि की पूर्वोक्त मारण विधियों से ही आठ बार वैदूर्य मणि को पुट दी जाय तो उसकी उत्तम भस्म हो जाती है ॥ ११६ ॥ मृतवैदूर्यस्य गुणाः सुमृतं खलु वैदूर्यं मधुरं शिशिरं परम् । दीपनं मेध्यमायुष्यं बल्यं च मलभेदनम् ॥ ११७ ॥ रक्तपित्तप्रशमनं चक्षुष्यं बृंहणं परम् ॥ पित्तामयप्रशमनं समाख्यातं विशेषतः ॥ ११८ ॥ वैदूर्य्यगुणाः—मधुरं शिशिरं परमित्यादिना । वदन्ति हि—वैदूर्यं रक्तपित्त- घ्नं प्रजायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं वृष्यमेव च" इति ॥११७,११८॥ भा.टी.—उत्तम वैदूर्य भस्म, मधुररस और अत्यन्त शीत गुणयुक्त होती है । यह पाचक अग्नि को उत्तेजित करती और धारणा शक्ति को बढ़ाती है । स्वस्थशरीर में इसके सेवन से आयु की वृद्धि होती है और शरीर में बल बढ़ता है । इसके सेवन से मल पतला होकर निकलता है। यह भस्म रक्तपित्त शामक, नेत्रों के लिए लाभदायक और शरीर को मोटा करनेवाली होती है क्योंकि यह शीत वीर्य और मधुररस द्रव्य है, अतः विशेष रूप से पित्तरोग शामक मानी जाती है ॥ ११७, ११८ ॥