रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३४ रसतरङ्गिणी ग्राह्यवैक्रान्तस्य स्वरूपम् अष्टास्रमष्टफलकं सितपीतासितारुणम् । मसृणं गुरु षट्कोणं वैक्रान्तं जात्यमुच्यते ॥१५७॥ श्वेतो नीलस्तथा रक्तः पीतः पारावतप्रभः । तार्क्ष्यभः कर्बुरः कृष्णो वर्णतश्चाष्टधा हि सः ॥१५८॥ अष्टास्रमिति ग्राह्यवैक्रान्तरूपम् । "वैक्रान्तः श्वेतपीतादिभेदादष्टप्रकारकः। स्वर्णरूप्यादिकरणे स्वस्ववर्णाः शुभो मतः । वैक्रान्तः कृष्णवर्णो यः षट्कोणो वसुकोणकः । मसृणो गुरुतायुक्तो निर्मलः सर्वसिद्धिदः" इति च प्राहुः प्राञ्चः ॥१५७, १५८॥ भा.टी.—जिस वैक्रान्त के खण्ड अष्टकोण और आठपहलवाले, श्वेतवर्ण, पीतवर्ण, कृष्णवर्ण अथवा रक्तवर्ण के चिकने-चमकीले, गुरु भार हों अथवा षट्कोण छः पहलवाले हों, उसे उत्तम वैक्रान्त कहा जाता है । वर्णभेद से वैक्रान्त आठ प्रकार का माना जाता है । १—श्वेतवर्ण, २—नीलवर्ण, ३— रक्तवर्ण, ४—पीतवर्ण, ५—पारावतप्रभ ( कबूतर के से वर्ण का ), ६— तार्क्ष्यभ ( गरुड़वर्ण या मरकतमणि वर्ण ), ७—कर्बुरवर्ण ( काला साँवला- वर्ण मिश्रित ), ८—कृष्ण ( काला ) वर्ण का होता है ॥१५७, १५८॥ वैक्रान्तशोधनस्य प्रथमः प्रकारः वैक्रान्तं पोट्टलीसंस्थं पटुक्षारसमन्वितम् । अम्लेन केनचिद्वापि कोद्रवक्वथितेन वा ॥१५६॥ गोमूत्रेणाथवा कामं प्रखरानलयोगतः । दोलायन्त्रे परिस्विन्नः शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥१६०॥ वैक्रान्तशोधनप्रकारः—पटु लवणम् । क्षारः यवक्षारः स्वर्जिका वा । स्वेद- नाद् निम्बूकादीनामम्लानां स्वरसकोद्रवक्वाथः गोमूत्रं कुलत्थक्वाथो वा ग्राह्यः ॥१५६, १६०॥ भा.टी.—वैक्रान्त के खण्डों को एक स्वच्छ कपड़े की पोटली में सैन्धा- नमक तथा सज्जीखार या जवाखार सहित बाँधकर इस पोटली को दोलायन्त्र में किसी अम्लद्रव कांजी या नींबू स्वरस को भरकर अथवा कोदों का क्वाथ अथवा गोमूत्र भरकर उसमें तीव्र अग्नि से स्वेदन ( पकाना ) करने पर वैक्रान्त अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥१५६, १६०॥