रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६३३ वैक्रान्त भी उन्हीं अवस्थाओं में और उसी वस्तु से बनता है जिससे कि हीरा। परन्तु हीरे के समान पूर्ण ताप तथा भार में प्राप्त न होने से (पृथ्वी के अन्तराल में) यह (वैक्रान्त) अर्धपक्व या दग्धावस्था में ही रह जाता है। अतः इसे दग्ध- हीरक के नाम से लिखा है। परन्तु यह कुछ भ्रमपूर्ण निर्णय है, क्योंकि हीरा कोयला (Carbon) से बनता है और उसमें कार्बन की अधिकता पायी जाती है, परन्तु वैक्रान्त के निर्माण में कार्बन निश्चित नहीं होता है। इस बात को देखकर कई नवीन अन्वेषकों के विचार में यह बात आ रही है कि अठपहलू—अष्टकोण या षट् पहलू—षट्कोण और चमक-दमक प्रभा, वर्ण कठोरता, उत्ताप सहन- शीलता आदि गुणधर्मों को देखते हुए वैक्रान्त “बिल्लौर पत्थर” है। क्योंकि बिल्लौर वैक्रान्त की उत्पत्ति करनेवाले स्थानों में पाया जाता है। और आजकल भी कहीं-कहीं विन्ध्य की पर्वत माला में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। और मौक्तिक गुण भी बिल्लौर के वज्र (हीरा) अथवा वैक्रान्तवत् ही हैं। बिल्लौर भी वज्रवत् कठोर ताप से पैदा होता है और कठोरता में हीरकवत् ही है। अतः बिल्लौर हीरे से बहुत कुछ सादृश्य रखता है। बिल्लौर में भी हीरे की सी काँच और कठोर धातुओं को काटने की शक्ति मानी जाती है। अतएव सम्भवतः “विक्रान्तयति लौहानि तेन वैक्रान्तकः स्मृतः” ऐसा पाया जाता है। बिल्लौर भी हीरकवत् पारदर्शक होता है। परन्तु कई रसशास्त्रियों के विचार में तुरमली वैक्रान्त है और यही विचार आजकल दृढ़ होता जा रहा है। परन्तु वर्तमान में प्राप्त होनेवाली तुरमली प्रायः कणरूप, भंगुर, साधारण कठोर, अग्निसहन शक्तियुक्त तथा उसमें खरोंचने से उसमें चिह्न पड़ जाते हैं। अतः उत्तम जातीय तुरमली वैक्रान्त हो सकती है। इसका अन्तिम निर्णय अभी विद्वानों के हाथ में है। वैक्रान्त आजकल अफ्रीका से विशेष रूप में पाया जाता है। वैक्रान्तस्य निर्वचनम् वज्रवत् सर्वरोगाणां हरणाय यतस्त्रिदम् । धत्ते विक्रान्तिमतुलां वैक्रान्तं कथ्यते ततः ॥१५६॥ वैक्रान्तपरिचयः—वज्रवत् सर्वरोगहरणायातुलां विक्रान्तिं धत्ते यतस्तस्मात् वैक्रान्तमिति निर्वचनम् ॥१५६॥ भा.टी.—क्योंकि यह वैक्रान्त सब रोगों को नष्ट करने की अनुपम शक्ति रखता है, अतः इसको “वैक्रान्त” शब्द से कहा जाता है ॥१५६॥