भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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त्रयोविंशस्तरङ्गः ६३५ द्वितीयः शोधनप्रकारः वैक्रान्तः सपटुक्षारः कुलत्थक्वाथयोगतः । दोलायन्त्रे परिस्विन्नः शुद्धिमाप्नोति यामतः ॥ १६१ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त के खण्डों को सैन्धानमक और यवक्षार सहित एक कपड़े की पोटली बाँधकर दोलायन्त्र में कुलत्थ क्वाथ भर उसमें तीन घंटे तक तीव्र अग्नि से स्वेदन करने पर वह शुद्ध हो जाता है ॥ १६१ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः वैक्रान्तं पोट्लीसंस्र्थं कदलीकन्दजद्रवे । दोलायन्त्रे परिस्विन्नं यामैकेन विशुद्ध्यति ॥ १६२ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त को एक कपड़े की पोटली में बाँधकर उसको कदली (केला) कन्दस्वरस में दोलायन्त्र द्वारा तीन घंटे तक पकाने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १६२ ॥ वैक्रान्तस्य प्रथमो मारणप्रकारः विमलबलिविमिश्रं चूर्णंवज्रस्य चूर्णं समदरदसमेतं निम्बुनीरेण पिष्टम् । द्विरदपुटसमाख्ये तत् पुटे सम्पुटस्थं वसुमितपुटपक्वं पञ्चतां याति नूनम् ॥ १६३ ॥ वैक्रान्तमारणम्—समगन्धकहिङ्गुलाभ्यामष्टपुटैः सम्पाद्यम् ॥ १६३ ॥ भा.टी.-शुद्ध वैक्रान्त चूर्ण में समभाग शुद्ध हिंगुल और शुद्ध गन्धक पृथक्-पृथक् मिलाकर नींबू स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । सूखने के बाद अच्छी तरह सम्पुट में बन्द करके इसको गजपुट में फूँक देवें । स्वांगशीत होने पर चूर्ण को निकाल फिर उसमें समभाग शुद्धपारद और गन्धक मिला नींबू के रस से मर्दन कर सुखा के फिर सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस विधि को आठ बार दुहराने से अवश्य ही वैक्रान्त की भस्म हो जाती है ॥ १६३ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः विशोधितं तु वैक्रान्तं यत्नतश्चूर्णंयेद्भिषक् । त्रिगुणं गन्धपाषाणं समं चैव रसेश्वरम् ॥ १६४ ॥ दत्त्वा निम्बूकतोयेन पेषयेद् याममात्रकम् । सुशुष्कं सम्पुटे न्यस्य पुटेद् गजपुटेन वै ॥ १६५ ॥