रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३६ रसतरङ्गिणी एवमष्टपुटैनैव वैक्रान्तं म्रियते ध्रुवम् । चतुर्थादिपुटेष्वत्र रसेशं न नियोजयेत् ॥ १६६ ॥ यद्वा वैक्रान्तं समपारदत्रिगुणगन्धकाभ्यां निम्बूक्ततोयेन पिष्ट्वा पुटनान्म्रियते । परं पुटत्रयदानान्तरं पारदक्षेपोऽनावश्यकः ॥ १६४-१६६ ॥ भा.टी.-शुद्ध वैक्रान्त को एक पक्के खरल में डालकर अच्छी तरह पीस- कर चूर्ण कर लें । अब इसमें वैक्रान्त से तिगुना शुद्ध गन्धक और वैक्रान्त के समभाग शुद्ध पारद मिलाकर नींबू के रस के साथ तीन घण्टे तक अच्छी तरह मर्दन करें । अच्छी तरह घुट जाने पर धूप में सुखा सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस तरह त्रिगुण गन्धक और समभाग पारद के साथ मर्दन करके तीन गजपुट देवें । फिर चौथे पुट से आठवें पुट तक इसको केवल शुद्धगन्धक ( त्रिगुण ) के साथ मर्दन कर गजपुट में फूँक देवें । इस विधि से सब मिलाकर आठ पुट देने से वैक्रान्त की उत्तम रूप से भस्म हो जाती है ॥ १६४-१६६ ॥ वैक्रान्तस्य गुणाः तत्तन्महागदहरः परमश्च मेध्यो वह्निप्रदीपनकरोऽतिरसायनश्च । दोषत्रयांपहरणो बहुयोगवाही वैक्रान्तकस्तु गदितः खलु वज्रतुल्यः ॥ १६७ ॥ वैक्रान्तकं परं त्वच्यं राजयक्ष्मनिषूदनम् । जराशोपादिशमनं ज्वरकुष्ठापहं तथा ॥ १६८ ॥ पाण्डूदरश्वासकासप्रमेहश्वयथुप्रणुत् । देहदार्ढ्यंकरश्चैव समाख्यातं विशेषतः ॥ १६९ ॥ वैक्रान्तगुणाः-ते ते प्रसिद्धाः महागदाः यक्ष्मप्रभृतयो महारोगाः तत्तन्महा- गदाः, तान् हरतीति । उक्तञ्चान्यत्र-"वैक्रान्तस्तु त्रिदोषघ्नः पडस्रो देहदार्ढ्य- कृत् । पाण्डूदरज्वरश्वासकासयक्ष्मप्रमेहनुत् ॥” इति ॥ १६७-१६६ ॥ भा.टी.-वैक्रान्त की भस्म सेवन करने से प्रसिद्ध महारोग, (यक्ष्मा, प्रमेह, अर्श, गुल्म, संग्रहणी, उदर आदि रोग ) नष्ट हो जाते हैं । यह मेधाशक्ति (धारणशक्ति ) को बढ़ाने के लिए उत्तम औषधि है । इसके सेवन से पुराना अग्निमान्द्य नष्ट हो जाता है । स्वस्थ शरीर में इसका सेवन उत्तम रसायन गुणों को उत्पन्न करता है । यह भयानक सन्निपात ज्वरों में त्रिदोष प्रकोप को शान्त करता है । और भिन्न-भिन्न रोग नाशक योगों में इसका मिश्रण करने से उन