रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशस्तरङ्गः ६३७ योगों की शक्ति बढ़ जाती है । वैक्रान्त की भस्म हीरे की भस्म के समान ही गुणकारी होती है । वैक्रान्तभस्म उत्तम, त्वच्य और राजयक्ष्म नाशक होती है। इसके अतिरिक्त यह जरा ( बुढ़ापा ) शोष, शोकशेष, आदि अनेकविध शोष रोगों को नष्ट करता है और जीर्णज्वर, नवीन ज्वर, कुष्ठ रोग, पाण्डुरोग, उदर रोग, श्वास, कास, प्रमेह और शोथ रोगों को मिटाता है । स्वस्थ शरीर में इसके सेवन से शरीर अत्यन्त मजबूत अर्थात् रोगनिवारण शक्ति युक्त हो जाता है ॥ १६७-१६६ ॥ मृतवैक्रान्तस्य मात्रा तत्त्वांशतो रक्तिकाया रुद्रांशप्रमितं मृतम् । वैक्रान्तकं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १७० ॥ वैक्रान्तभस्मनो मात्रानिर्देशे—तत्त्वांशः चतुर्विंशतितमोंऽशः, रुद्रांशः एका- दशांशः ॥ १७० ॥ भा.टी.—वैक्रान्तभस्म को रोग और रोगी का बल तथा देश काल आदि का अच्छी तरह निर्णय करके एक रत्ती के चौबीसवें भाग से लेकर रत्ती का ग्यारहवाँ भाग तक प्रयोग करना चाहिए ॥ १७० ॥ मृतवैक्रान्तस्य आमयिकः प्रयोगः प्रथमं वैक्रन्तरसायनम् सुमृतं खलु वैक्रान्तं चतुर्गुञ्जामितं शुभम् । तोलकैकमितञ्चैव सुमृतं घनसत्त्वकम् ॥ १७१ ॥ रसेश्वरञ्च सुमृतं तोलकार्द्धकसंमितम् । आदाय खल्वे सम्मर्द्य शाल्मलीमूलवारिणा ॥ १७२ ॥ कारयेद्रसतन्त्रज्ञो रक्तिकैकांमितां वटीम् । एकैकां वटिकां दद्यात् समध्वाज्यं तु प्रत्यहम् ॥ १७३ ॥ रसायनमिदं बल्यं वृष्यं वर्ण्यञ्च वृंहणम् । क्लैब्यापहञ्च परमं नास्ति भेषजमीदृशम् ॥ १७४ ॥ आमया न प्रशाम्यन्ति येऽन्यभेषजसेवया । एतद्रसायनाभ्यासात् यान्ति शान्तिं तु निश्चितम् ॥ १७५ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से मारित वैक्रान्त चार रत्ती, उत्तम रूप से भस्म किया हुआ अभ्रकभस्म एक तोला, उत्तम पारदभस्म आधा तोला लेकर एकत्र खरल में डालें । अब इसको सेमर की जड़ के स्वरस के साथ खूब अच्छी तरह