रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६३८ रसतरङ्गिणी मर्दन करें। जब मर्दन करते हुए गोली बनाने के योग्य हो जाय तो इसको एक एक रत्ती की गोलियाँ बना लें और धूप में सुखा कर रख लें। इनमें से प्रतिदिन एक-एक गोली शहद और घी (मक्खन) के साथ सेवन करायें। यह वैक्रान्त रसायन सेवन करने में बलकारक, उत्पादक अंगों के लिये शक्ति-वर्धक, वर्ण्य और शरीर में मांस की वृद्धि करनेवाला है। नपुंसकता को दूर करने में इससे उत्तम कोई औषधि नहीं है। इसके अतिरिक्त वे सब रोग जो किसी अन्य औषधि सेवन से शान्त नहीं होते हैं। इस औषधि (वैक्रान्तरसायन) से निश्चित ही शान्त हो जाते हैं ॥ १७१-१७५ ॥ द्वितीयं वैक्रान्तरसायनम् वैक्रान्तकं तु सुमृतं रक्तिकाष्टकसंमितम् । पादांशिकञ्च सुमृतं काञ्चनं नष्टचन्द्रिकम् ॥ १७६ ॥ विमलं रससिन्दूरं तोलकद्वयसम्मितम् । आदाय खल्वे संमर्द्य शाल्मलीमूलवारिणा ॥ १७७ ॥ रक्तिकैकमितारम्यां वटिकां कारयेत्ततः । रसज्ञैः कीर्तितमिदं वैक्रान्तकरसायनम् ॥ १७८ ॥ मारिचाज्यकणायुक्तं मासद्वयमनारतम् । रसायनमिदं यत्नात् सपथ्यं परिशीलितम् ॥ १७९ ॥ विनिहन्ति जराशोषं राजयक्ष्माणमुल्वणम् । ध्वजभङ्गं तथा क्लैब्यं कासं श्वासञ्च दारुणम् ॥ १८० ॥ अर्शांसि वह्निमान्द्यञ्च ग्रहणीं पाण्डुकामलाम् । उरःक्षतादिकान् रोगान् नाशयेत्याशु निश्चितम् ॥ १८१ ॥ नष्टचन्द्रिकमिति सुमृतस्वर्णपरीक्षा। सपथ्यमिति हिताहारविहाराभ्यां सह ॥ १७६-१८१ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से मारित वैक्रान्त आठ रत्ती, चन्द्रिका रहित उत्तम स्वर्णभस्म दो रत्ती, उत्तम रससिन्दूर (द्विगुण गन्धक जारित) दो तोला लेकर सबको एकत्र खरल में सेमर की जड़ के स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनाने के योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की सुन्दर गोलियां बनाकर सुखा लें। इस योग को रसशास्त्रज्ञ "वैक्रान्त रसायन" नाम से कहते हैं। इस रसायन की एक गोली को मरिचचूर्ण और पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर घी या मक्खन के साथ दो महीने तक निरन्तर पथ्यपूर्वक सेवन करने से जरा-