रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—खानों से प्राप्त होनेवाले संखिया, हरताल, मैनसिल, पारद, ताम्र आदि को तथा वनौषधियों से प्राप्त होनेवाले वत्सनाभ, शृंगिक, कुचला आदि को स्थावर विष कहा जाता है और सर्प, बिच्छू, मकड़ी, बावलाकुत्ता आदि के विष को जंगम विष कहा जाता है ॥ ३ ॥ स्थावरविषस्य भेदाः अधिष्ठानविभेदेन विषं स्थावरसंज्ञकम् । समाख्यातं दशविधं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥ ४ ॥ भा.टी.—स्थावर संज्ञक विष अधिष्ठान (आश्रय) भेद से दस प्रकार का रसतन्त्रज्ञों ने माना है ॥ ४ ॥ स्थावरविषस्य अधिष्ठानानि कन्दः सारोऽथ निर्यासः पुष्पं मूलं फलं दलम् । त्वक् क्षीरं खनिरित्यस्य ह्यधिष्ठानानि वै दश ॥ ५ ॥ भा.टी.—कन्द, सार, निर्यास (गोंद), पुष्प, मूल, फल, पत्र, त्वचा, दूध, तथा खान; ये दश स्थावर विष के आश्रय हैं ॥ ५ ॥ प्रकारान्तरेण स्थावरविषस्य द्वैविध्यम् विषं चोपविषं चेति द्विविधं स्थावरं विषम् । प्रथमं वत्सनाभादि द्वितीयं तिन्दुकादिकम् ॥ ६ ॥ अपि च स्थावरं विषं विषोपविषभेदादपि द्विविधमाचख्युः प्राज्ञाः । तदेत- दाह प्रथमं वत्सनाभादीति ॥ ६ ॥ भा.टी.—स्थावर विष के भी विष (प्रधान विष) तथा उपविष (अप्र- धान विष) भेद से दो भेद होते हैं। विषों में वत्सनाभ, शृंगक, कालकूट, हलाहल, संखिया आदि लिये जाते हैं। उपविषों में तिन्दुक (कुचला), कनेर, गुञ्जा, अफीम कलिहारी आदि लिये जाते हैं ॥ ६ ॥ विषस्य नव भेदाः हालाहलः कालकूटः शृङ्गकश्च प्रदीपनः । सौराष्ट्रिको ब्रह्मपुत्रो हारिद्रः सक्तुकस्तथा ॥ ७ ॥ वत्सनाभ इति ज्ञेया विषभेदा अमी नव । रसे रसायनादौ च वत्सनाभः प्रशस्यते ॥ ८ ॥