भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ६४७ चाहुः—"म्रियन्ते मक्षिकाः, प्राश्य काकः क्षामस्वरो भवेत्" इत्यादिना अपि च स्मरन्ति हि—"पुरा खल्वमृतार्थं सुरासुरैः सलिलनिधेर्मथ्यमानात् क्रोध इव रूपवान् सत्त्वं समुद्बभूव कृष्णमनलनयनमूर्ध्वप्रदीप्तकेशं दंष्ट्राकरालं भैरवारावरू- पम् । तद्दर्शनादेव यतो देवा दानवाश्च विषण्णास्तस्मात्तद्विषसंज्ञामवाप । तत्स- हसैव सर्वभूतानि निर्दग्धुकाममुपयोगविशेषैर्विषममृततां विनयमानो ब्रह्मानुनीयौ- षधिषु न्यस्तवान् । तत्तत्स्थावरासु मूर्तिष्वधिवसनात् स्थावरमित्युच्यते । जाङ्गमं पुनः पृथिव्या भारावतारार्थमुरगादिरूपेण श्रीविष्णुर्निर्ममे" इति ॥ १ ॥ भा.टी.- संखिया, सक्तुक, हालाहल, आदि द्रव्यों को इसलिए विष कहा जाता है कि इनको देखने से ही मनुष्य तथा पक्षी और पशु अत्यन्त दुःखी हो जाते हैं। अथवा यह विष मनुष्य को मृत्युपाश द्वारा (बन्धन) नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ॥१॥ वक्तव्य—चरकादि ग्रन्थों में भी "विष" की यही निरुक्ति लिखी है कि जब सुर और असुरों ने मिलकर अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र का मंथन किया, तो अमृत निकलने से पूर्व एक ऐसा पदार्थ उसमें से प्राप्त हुआ जिसको देखकर वहाँ उपस्थित सब देवता और असुर विषण्ण (अत्यन्त दुःखी) और शिथिल- देह हो गये । अतएव यह तब से "विष" शब्द से कहा जाने लगा । "जगद्वि- षण्णं तं दृष्ट्वा तेनासौ विषसंज्ञकः । दर्शनादेव यतो देवा दानवाश्च विषण्णा- स्तस्मात्तद्विषसंज्ञामवाप" । विषस्य नामानि तद्वैविध्यञ्च विषं दवेडञ्च गरालं कालकूटञ्च तन्मतम् । स्थावरं जङ्गमञ्चेति द्विविधं विषमुच्यते ॥ २ ॥ विषनामानि तन्त्रव्यवहृतानि, तच्च द्विविधं स्थावरजङ्गमप्रभेदादिति । स्थावरं दशविधमधिष्ठानभेदात् । स्मरन्ति हि—"स्थावरं मूलपुष्पफलदलत्व- क्सारनिर्यासद्वीरधातुकन्दभेदाद्दशाधिष्ठानम्" इति । मूलादिविषाणां परिचय- विस्तरस्त्वाकरेभ्य एव अगदोहत्यावलोकनीय इत्यत्र विस्तरभयाद् विरमामः ॥२॥ भा.टी.—विष के दवेड, गरल, कालकूट, ये नाम कहे जाते हैं । यह विष स्थावर (वनस्पति आदि में होनेवाला) और जंगम (सर्प, बिच्छू, चूहा, मकड़ी आदि में होनेवाला ) भेद से दो प्रकार का होता है ॥ २ ॥ स्थावरजङ्गमविषयोः स्वरूपम् खन्यौषधाश्रयं यत्तु विषं तत्स्थावराह्वयम् । सर्पादिजन्तुप्रभवं विषं जङ्गमसंज्ञकम् ॥ ३ ॥