भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 678, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 678

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५३ पोटली में बाँधकर बकरी के दूध के द्वारा दोलायन्त्र में तीन घण्टे तक स्वेदन करने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ अथ वत्सनाभस्य गुणाः विषं तु कटुकं तिक्तमुष्णं चैव कषायकम् । योगवाहि परं चेतन्महोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २६ ॥ त्रिदोषघ्नं विशेषेण मतं वातबलासनुत् । दीपनं शीतशमनं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ २७ ॥ अग्निमान्द्यप्रशमनं प्लीहोदरनिबर्हणम् । वातरक्तापहं चैव श्वासकासविधूननम् ॥ २८ ॥ गुदामयग्रहणिाकागुल्मनिर्दलनं परम् । कुष्ठपाण्डुज्वरहरं त्वामवातप्रणाशनम् ॥ २६ ॥ विनिहन्ति विशेषेण तिमिरं च निशान्धताम् । अभिष्यन्दं नेत्रशोथं कर्णशोथञ्च दारुणम् ॥ ३० ॥ कर्णशूलं शिरःशूलं गृध्रसीं कटिवेदनाम् । आखुवृश्चिकसर्पाणां विषं चैवाविलम्बितम् ॥ ३१ ॥ विषन्तु कटुकमिति वत्सनाभस्य गुणाः । बृंहणं शरीरधातुवृद्धिकरम् । गुदामयाः अर्शांसि ॥ २६–३१ ॥ भा.टी—वत्सनाभ कटु तिक्त और कषायरस उष्ण गुण और उत्तम योग- वाही धर्मवाला होता है । यह विधिपूर्वक सेवन करने से श्रेष्ठ रसायन गुण करता है । यह अन्त:प्रयोग में त्रिदोष ( पित्त तथा कफ ) नाशक है, किन्तु विशेष रूप से वात और कफनाशक है । इसके सेवन से अग्नि वृद्धि होती है और शीत-प्रभाव शान्त हो जाता है । शरीर में पुष्टिके साथ बल की वृद्धि होती है । इसके सेवन से अग्निमान्द्यरोग, प्लीहोदररोग, वातरक्तरोग तथा श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको बवासीर, संग्रहणी और गुल्महर योगों में मिला- कर देने से उक्त व्याधियों को समूल नाश करता है। इसके सेवन से कुष्ठ (त्वचा के रोग), पाण्डु तथा ज्वर और आमवात रोगों में आराम आता है । इसके निरन्तर उपयोग से तिमिर तथा रात्र्यन्धता में विशेष रूप से आराम आता है । नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, कर्णशोथ, कर्णशूल, गृध्रसी तथा कटिवेदना में इसका प्रयोग सुखजनक होता है । इसीतरह बाह्य प्रयोग में यह चूहा, बिच्छू तथा सर्प विषों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥ २६–३१ ॥