रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६६ रसतरङ्गिणी के सेवन से उक्त सब कष्ट मिट जाते हैं । तीव्र ज्वर में होनेवाले अतीसार में अथवा अतीसार में होनेवाले तीव्र वेग और अत्यन्त तापांशवाले ज्वर में यह आनन्दभैरवरस उत्तम कार्य करता है । इसी तरह इस आनन्दभैरवरस को अजीर्णशूल और प्रबलज्वरयुक्त कफवातप्रकोपजन्य प्रवाहिका में, ज्वर और प्रवाहिका में बड़ी जामुन के पत्तों के स्वरस के साथ सेवन करने से शीघ्र आराम आता है ॥६६-६८॥ जयावटी विषं निशा कटुत्रिकं कृमिघ्ननिम्बुमुस्तकम् । समं समं समोन्मितं जयन्तिकाशफारजः ॥६६॥ समाहरेद्भिषग्वरो वटीं द्विगुञ्जासंमिताम् । प्रमापयेत्तु नामतो बुधैर्मता जयावटी ॥१००॥ जयावटी विशेषतः प्रमेहकासपाण्डुजित् । नवज्वरापहा परं तथैव रक्तपित्तनुत् ॥१०१॥ जयावटी—निशा हरिद्रा, कृमिघ्नं विडङ्गम् । रोगप्रयोगस्तु यद्यप्यनुपान- भेदेन तन्त्रान्तरेषु विस्तरेणोक्तः, तथापि विषप्रयोगमधिकृत्य विशेषतो येषु येषु रोगेषु प्रयुज्यते तेषामेव परिसंख्यानम् ॥६६-१०१॥ भा.टी.—शुद्धवत्सनाभ, हरिद्राचूर्ण, सोंठचूर्ण, मरिचचूर्ण, पिप्पलीचूर्ण, वायविडंग चूर्ण, निम्बपत्रचूर्ण, मुस्ता (मोथा) चूर्ण, जयन्तीमूलचूर्ण; प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करें। गोली बनाने के योग्य हो जाने पर इसको दो-दो रत्ती की गोलियाँ बनालें । इसको विद्वान् वैद्य लोग जयावटी के नाम से व्यवहार करते हैं । यह जयावटी विशेष रूप से प्रमेह कास तथा पाण्डुरोग नाशक है । नवज्वर में प्रयोग करने से ज्वर शान्त हो जाता है और रक्तपित्त रोग में भी यह उत्तम लाभ पहुँचाती है ॥६६-१०१॥ जयावटिकाया आमयिकः प्रयोगः चन्दनस्य कषायेण शीलिता तु जयावटी । रक्तपित्तं निहन्त्याशु सज्वरं त्वविलम्बितम् ॥१०२॥ बलामूलकषायेण शालिता तु जयावटी । जत्रूर्ध्वपञ्चमीनाडीगतं शूलं व्यपोहति ॥१०३॥ मुस्तेन्द्रयवविश्वानां क्वाथेन तु जयावटी । शीलिता ग्रहणीं हन्ति सज्वरामतिदारुणाम् ॥१०४॥ पर्पटस्य कषायेण जया तु परिशीलिता ।