रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६६७ विनाशयति पित्तोत्थं ज्वरं खल्वतिदारुणम् ॥ १०५ ॥ भा.टी.—ज्वरयुक्त रक्तपित्त में जयावटी को रक्तचन्दन के कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र ही रक्तपित्त में आराम आता है। यदि जयावटी को खरेंटी- मूलकषाय के साथ सेवन कराया जाय तो जत्रु के ऊर्ध्वभागगामी पञ्चमी नाडी (Fifth Nerves) के शूलमें (सूर्यावर्त, अर्धावभेदक आदि) शीघ्र आराम आ जाता है। अति भयंकर ज्वरयुक्त संग्रहणी रोग में इस जयावटी को मोथा, इन्द्रजौ और सोंठ के कषाय के साथ प्रयोग कराने से शीघ्र आराम आता है। अति भयंकर पित्तप्रकोपजन्य ज्वर में जयावटी को पित्तपापड़े के कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र ज्वर कम हो जाता है ॥ १०२-१०५ ॥ कफकेतुरसः अमृतं तोलकंमितं गोमूत्रपरिशोधितम् । पिप्पली शंखभसितं टङ्कणं चैव तन्मितम् ॥ १०६ ॥ शृङ्गवेररसेनैव पेषयेत्त दिनत्रयम् । गुञ्जाधेमात्रा वटिकाः कर्त्तव्याः खलु यत्नतः ॥ १०७ ॥ रसोऽयं भाषितो नाम्ना कफकेतुसमाह्वयः । प्रतिश्यायं तथा कासं कण्ठरोधं विनाशयेत् ॥ १०८ ॥ गलग्रहं कर्णरोगं श्वासं प्रतमकाभिधम् । विनिहन्ति विशेषेण रसोऽयमविलम्बितम् ॥ १०६ ॥ कफकेतुरसः—शृङ्गवेररसेन आर्द्रकरसेन । अनुपानानि आवस्थिकः प्रयोग- कालश्चानुभूतचरो विशदीकृतः ॥ १०६-१०६ ॥ भा.टी.—गोमूत्र से शुद्ध किया हुआ अमृत (वत्सनाभविष) एक तोला पिप्पलीचूर्ण, शंखभस्म और शुद्ध टंकण (सुहागा); प्रत्येक विष के समभाग लेकर सब को एकत्र खरल में अदरख के स्वरस के साथ तीन दिन तक मर्दन करें। गोली बनाने पर इसकी आधी-आधी रत्ती की गोलियाँ बना- कर सुखा लें। इसको कफकेतुरस कहते हैं। यह कफकेतुरस प्रतिश्याय, कास तथा कण्ठ के रोगों को नष्ट करता है। गले में कफ प्रकोप से रुकावट होने पर और कर्णरोगों तथा विशेषरूप से प्रतमक श्वास (दमा) रोग में यह बहुत शीघ्र ही लाभ पहुँचाता है ॥ १०६-१०६ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः क्षौद्रार्द्रकरसोपेतो रसोऽयं परिशीलितः ।