भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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साज्यं संघृतम् लेपनात् दंशदेशे । नतं तगरम् । विषगर्भाभिधं तैलं विषगर्भतैलम्, तद्यथा- “धत्तूरस्य रसस्य पञ्चकुडवं तैलं तथा काञ्जिकं प्रस्थानाञ्च चतुष्टयं गद- वचा त्रिंशत्परं शाणकाः । हृद्धार्वीमरिचात्पृथङ् नव विषात् षट् स्वर्णबीजात्पटोः स्युः सप्ताधिकविंशतिः परिमितं तीव्रानिलध्वंसनम्” ॥१५१-१६२॥ भा.टी.-हरिद्रा स्वरस में पिसा हुआ शुद्ध वत्सनाभ, भांगरे के स्वरससे शुद्ध की हुई मैनसिल, अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण किया हुआ शंख, समुद्रफेन, सैन्धानमक, पिप्पलीचूर्ण, हरीतकीचूर्ण, बहेड़े की मज्जा, करञ्जबीजमज्जा; वृक्षाम्ल (आलु बोखारा) कालीमिर्च चूर्ण, मञ्जिष्ठाचूर्ण, लालचन्दन, सब द्रव्य समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरीके दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्तियाँ बनाने के योग्य हो जाय तो उसकी लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बनाकर सुखा लें। इन बत्तियों को 'विषप्रभा' नाम से कहा जाता है। इस वर्त्ती को जल में पीस कर आंखों में लगाने से नेत्रशुक्ल (फूला), अर्म, मांस पिल्ल आदि नेत्रोंके रोग नष्ट होते हैं। शुद्ध वत्सनाभ को सिरसके पत्र तथा फूलों के साथ पीसकर उचित मात्रा में सेवन करने से विशेष रूप से चूहे का विष नष्ट होता है। सर्पविष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को कदली कन्द स्वरस में पीसकर उसमें गोघृत मिलाकर खिलाना और दंशस्थान में लेप करना चाहिये। सब प्रकार के मूषक (चूहा) विष को नष्ट करने के लिए वत्सनाभ को गोतक्र के साथ थोड़ी मात्रा में सेवन कराने से निश्चय ही चूहोंका विष शान्त हो जाता है। वत्सनाभ को शुद्ध तिल तैल में घिस कर लेप करने से शीघ्र ही बिच्छू के काटने की पीड़ा शान्त हो जाती है। सब प्रकार के लूता (मकड़ी) विष को नष्ट करने के लिये थोड़े से वत्सनाभ को आक के दूध में घिस कर लेप करना चाहिये। कूट, इलायची- बीज, बाकुची, जटामांसी, देवदारु तथा तगर के साथ विष मिलाकर जल में पिलाने और दंशस्थान पर लेप कराने से सब प्रकार के विष नष्ट हो जाते हैं। अन्य शास्त्रोक्त “विषगर्भ” नामक तैल की प्रतिदिन शरीरमें अभ्यंग करने से, मन्यास्तम्भ (गरदन की अकड़ाहट), हनुस्तम्भ, पक्षाघात (लकवा), परिग्रह (सब शरीर का टूटना) तथा सर्व शरीर की अकड़ाहट, पृष्ठ, त्रिकस्तब्धता, कग्र तथा और भी सब प्रकार की वातिक वेदना इस तैल की मालिश से शान्त हो जाती है ॥१५१-१६२॥ अथ उपविषाणां नामानि विषतिन्दुकबीजं च त्वाह्विफेनञ्च रेचकम्