रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६७७ कुसुमं लघुशुक्लञ्च हरिदाभञ्च कोमलम् । नारङ्गरङ्गं मसृणं फलं रम्यं सुवर्तुलम् ॥१६६॥ मज्जा शुभ्रा कोमला च बीजं वृत्तञ्च रोमशम् । बीजमेव चिकित्सायां विबुधैर्विनियुज्यते ॥१७०॥ कोङ्कणे च तथा वङ्गे दक्षिणे च विशेषतः । देशेष्वन्येषु च तथा जायते विषतिन्दुकम् ॥१७१॥ तत्रादौ विषतिन्दुककीर्तनं कुचेलकमित्यादि—भक्षितप्रभा भस्मसदृशप्रभा- युक्ता । स्पष्टाः शिराः यत्र तादृशम् पत्रवृन्तकञ्च ह्रस्वकम् इत्यन्वयः । हरिदाभं ईषद्वरिद्वर्णम् । मज्जा फलमज्जा ॥१६७–१७१॥ भा.टो.-कुचला शिखिजाति का वृक्ष माना जाता है। इसका कांड (तना) टेढ़ा और मोटा होता है । इसके तने की छाल कुछ राख जैसे रंग ( चमक ) की होती है । इसका प्रायः गोल, चिकना और अखण्डित (पूरा) होता है । इसके पत्र का रंग हरा होता है और इसमें शिरायें ( नाडियां ) स्पष्ट दिखाई देती हैं और पत्रवृन्त (डंठल) छोटे-छोटे होते हैं । इसका फूल छोटा सफेद हरे रंग का और कोमल होता है । कुचले का फल नारंगी के रंग का सुन्दर गोल और चिकना होता है । फल के भीतर पायेजानेवाली मज्जा ( गूदा ) कोमल और सफेद होती है । इसी मज्जा में पायाजानेवाला बीज गोल टिकिया जैसा और रोंएदार होता है । इसी बीज को विद्वान् चिकित्सक चिकित्सा कार्य में लाते हैं । कुचले का वृक्ष कोंकण, बंगाल तथा दक्षिणीय प्रदेशों में विशेष रूप से पाया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य देशों में भी पाया जाता है ॥१६७-१७१॥ वक्तव्य कुचला भारतवर्ष के गरम प्रदेशों में विशेष रूप से पाया जाता है । इसका वृक्ष बड़ा सुन्दर ४० फीट ऊँचा, तना सीधा टेढ़ा, पत्ते चौड़े अंडा- कृति आमने-सामने पूर्णधार, ३ से ६ इञ्च तक लम्बे और ३ से ५ नाड़ियोंवाले, फूल हरे से श्वेत, अनेक छोटे-छोटे शाखाओं के अन्त में पतली पुष्प नालों पर गुच्छों में लगते हैं । फूलों से हरिद्रा जैसी गन्ध आती है । इसका फल भूमएड- लाकार चिकना, नारंगी जितना और नारंगी रंग का होता है । ऊपर के पतले छिलके अन्दर नरम श्वेत कड़वा, लिचलिचा गूदा होता है जिसमें १ से ५ बीज होते हैं । इसका बीज आधा इंच व्यास, चपटी. गोल, एक पृष्ठनतोदर और दूसरा उन्नतोदर, चमकीले रेशमी बालों से युक्त, भूरा विषैला और कड़वा होता