रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७८ रसतरङ्गिणी है । यही बीज चिकित्सा में काम आते हैं । इस बीज में आधा % प्रतिशत एक क्षारीय तत्त्व होता है जिसे स्ट्रिकनीन (Strychnine) कहते हैं। एक और भी क्षारीयतत्त्व चौथाई से— १ % होता है जो Brucine कहाता है । ये दो तत्त्व कुचलाबीज-चूर्ण की अपेक्षा अधिक तीव्र और घातक होते हैं। यदि कुचला को बिना शुद्ध किये अथवा अधिक मात्रा में खा लिया जाय तो धनुष्टंकार, आक्षेप, और पेशी मण्डल में वेदना, अधिक तृष्णा, बेचैनी और मुख मण्डल में तीव्र लालिमा (मुख लाल वर्ण) हो जाती है । अतः इसको अवश्य शुद्ध करके और मात्रापूर्वक ही प्रयोग करना चाहिए । विषतिन्दुकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः विषतिन्दुकबीजानि विन्यसेद् गृहवारिणि । दिनत्रयं प्रयत्नेन त्वपनीय बहिस्त्वचम् ॥१७२॥ निदाघे चाथ संशोष्य चूर्णयेद्भिषजां वरः । एवं विशुद्धिमायाति सर्वथा विषतिन्दुकम् ॥१७३॥ भा.टी.—परिपक्व कुचलाबीजों को काञ्जी में तीन दिन तक पड़े रहने दें । तीन दिन के बाद बीजों को काञ्जी से निकाल इसकी बाहरी त्वचा को छीलकर निकाल दें । और धूप में सुखाकर लोहे के खरल में खूब कूटकर चूर्णकर लें । इस विधि से कुचला सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥१७२, १७३॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः कारस्करस्य बीजानि त्वतिमन्दाग्नियोगतः । निधाय पिष्टपचने तावदाज्येन भर्जयेत् ॥१७४॥ यावद् बहिस्त्वचा किञ्चिज्जायते कपिशप्रभा । कुचेलमेवं त्वरितं शुद्धिमायात्यनुत्तमम् ॥१७५॥ द्वितीयः प्रकारः—पिष्टपचनं ‘तवा’ इति हिन्दीभाषायाम् । कपिशप्रभा किंचिद्रक्तपीता । उक्तञ्चान्यत्र —“किञ्चिदाज्येन संभृष्टो विषमुष्टिर्विशुद्ध्यति” इति ॥१७४, १७५॥ भा. टी.—कुचले के बीजों को एक तवे में थोड़ा सा घी डालकर मन्द- मन्द अग्नि से तब तक भूनें जब तक कि बीजों की बाहरी त्वचा कपिशवर्ण (कुछ लाल-पीली सी) न हो जाय । उक्त कपिशवर्ण होने पर बाहरी छाल को पृथक् करके भीतरी मज्जा को उसी समय गरम-गरम कूट लें इस विधि से शीघ्र आवश्यकता पड़ने पर कुचले को शुद्ध किया जाता है ॥१७४, १७५॥