रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६८१ मुहुर्मुहुर्मलत्यागवाञ्छयाऽतिनिपीडितम् । कष्टप्रवृत्त्याल्पमलं विनिहन्ति गुदामयम् ॥२०२॥ विषतिन्दुकगुणाः—आग्नेयं उष्णवीर्यम्, सारमेयः कुक्कुरः, तस्य विषं हरतीति तथा । दुष्टमशुद्धं यत् नागं सीसकं तस्य अशनात् भक्षणात् उद्भूतं जातं अर्धाङ्गवातमित्यन्वयः । मांसपेशीशोषादिलक्षणयुते पक्षाघातेऽस्य प्रयोगो निषिद्धः । मदात्ययस्य अत्ययो नाशनम् । अर्धावभेदकः शिरोरोगविशेषः । श्रमनिःश्वासरोधाज्जातः कासः श्रमकासः, तस्य निबर्हणम् । अथवा श्रमं कासं च नाशयतीति योज्यम् । निम्ननिर्दिष्टाः अनुपद्मेव वक्ष्यमाणाः । अत्यल्पा मात्रा गुञ्जापादांशादप्यत्यन्तं हीनाः । गोमूत्रशुद्धस्य—षोडशांशश्चतुर्विंशतितमो वांशो योज्यः । तेषु रोगेषु तेषु तेष्वभिहितेषु लक्षणेषु सत्सु प्रयुक्तोऽनया मात्रया सिद्धिकरः कारस्करः । समयात्पूर्वकालिकमिति रजःस्रावसमयात् मासात् पूर्वकाले भवम् । अनारतं निरन्तरम् । उदरामयोऽतीसारः ॥१७८–२०२॥ भा.टी—कुचला बहुत उष्णवीर्य द्रव्य है, इसका बीज रस मै कड़वा और उत्तम दीपन होता है । इसका प्रभाव बहुत तीव्र होता है । इसका सार (Extract अथवा Tincture) अतितीव्र होता है । बीज चूर्ण की अपेक्षा वह कास शक्ति को बढ़ाने में उत्तम गुण रखता है । अम्लपित्त को शान्त करता है और मूत्र अधिक मात्रा में लाता है तथा अधिक भूख लगाता है। इसके सेवन से आम रस का पाक होता है । अंगों के भीतर होनेवाला कफ सञ्चय या प्रकोप शान्त होता है । इसके सेवन से शरीर में बल वृद्धि होती है । शरीर में बढ़े हुए मोटेपन को घटाता है और भोजन में रुचि उत्पन्न करता है । यह पागल कुत्ते के विष को नष्ट करने में उत्तम गुण रखता है । इसके सेवन से ग्रहणी रोग, उन्माद रोग, उदाराध्मान (अफ़ारा) तथा पुरातन अजीर्ण रोग नष्ट होते हैं । आमाशयजन्य शूल और हृदय की दुर्बलता को मिटाता है । इसके सेवन से श्वास (दमा) में आराम आता है और फुप्फुसशोथ (निमोनिया) नष्ट होता है । अर्धाङ्गवात तथा अर्दित वात व्याधि में यह लाभ करता है और नाड़ी के बल को बढ़ाता है । अशुद्ध सीसे के खाने से उत्पन्न अथवा मदात्ययरोग से उत्पन्न हाथ और पैरों तथा मुख में होनेवाले अर्धाङ्ग वात को नष्ट करता है । परन्तु कुचले के चूर्ण या इसके अन्य रस क्रिया आदि योगों को स्पर्शज्ञान रहित, कठिन मांस पेशी शोष युक्त नूतन पक्षाघात में प्रयोग नहीं करना चाहिये ।