रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६८३
होता हो, कुचले के प्रयोग से आराम आ जाता है। ऐसे बवासीर रोग में भी कुचला प्रयोग से लाभ होता है, जिसमें बार-बार शौच जाने की इच्छा करती हो और बड़ी कठिनाई के साथ थोड़ा-थोड़ा शौच (मल) आता हो ॥१७८-२०२॥ वक्तव्य—कुचला सेवन करने से आमाशय तथा अन्य पाचन अंगों की निर्बलता हटती है, जिससे इन अंगों में बल आ जाता है और ये अपना कार्य अच्छी तरह करने लगते हैं। आँतों की आकुंचक तथा प्रसारक शक्ति बढ़ जाने से मलबन्ध हट जाता है। यह श्वास स्थान को उत्तेजित करता है। श्वास काठिन्य हटता और श्वास गहरा तथा बलवान् हो जाता है। यह मस्तिष्क की शक्ति को भी बढ़ाता है। वातनाड़ियों को उत्तेजित करके मांसपेशियों को दृढ़ तथा उत्तेजित करता है, जिससे हृदय बलवान होता है और श्वास भी बलवान् होकर सारे शरीर के अंग बल अनुभव करते हैं। इसके सेवन से उत्पादक अंग भी बलवान् होते हैं। दृष्टि श्रवण आदि की शक्तियाँ भी बढ़ जाती हैं। निर्बलता के कारण उत्पन्न हुई मन्दाग्नि के लिए यह उत्तम औषधि है। ऐसी अवस्था में भोजन के पीछे कुचला योग जैसे अग्नितुण्डी वटी दे अथवा सायं प्रातःकाल पञ्चतिक्तपानक के साथ कुचला आसव की ५ से १० बूंद मिलाकर देनी चाहिए। निर्बलता से मलबन्ध में कुचला चूर्ण और कुमारी- सार समान मिला गोलियाँ बनाकर दी जाती हैं। आंतों की निर्बलता से उत्पन्न गुदभ्रंश को हटाने के लिए कुछ काल तक इसका प्रयोग करने से अवश्य लाभ होता है। क्लैब्यरोगों के लिए कुचला का अन्तःप्रयोग तथा अनेकविध तैलों में बहिः प्रयोग किया जाता है। सर्पविष में तथा अहिफेनादि नींद लानेवाले विषों की अधिक मात्रा खाये जाने पर कुचला वारुणीसार अथवा स्ट्रकनीन हाइड्रोक्लोराइड (Strychnine Hydrochloride) को ३०वे भाग से १५वे भाग यवकी मात्रा में सूचीवेध द्वारा देना चाहिए। कुचला या स्ट्रकनीन (Strychnine) की अधिक मात्रा खायी जाने पर आधा या घंटे बाद लक्षण उत्पन्न होते हैं। पहिले पृष्ठ बाहु और जंघाओं में शूल होती है, फिर भिन्न-भिन्न मांसपेशियों में स्तम्भ हो जाता है और स्तम्भ (टेटेनिस) रोग के लक्षण होते हैं, परन्तु अति शीघ्रताके साथ होते हैं। स्तम्भरोग में प्रारम्भ में ही हनुस्तम्भ हो जाता है, परन्तु कुचला विष में हनुस्तम्भ प्रारम्भ में न होकर अन्त में होता है। इन विष लक्षणों को शान्त