रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 709, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें६८४ रसतरङ्गिणी करने के लिए वमन देना चाहिए और हरीतकी कषाय पिलावें। तीव्र लक्षणों को शान्त करने के लिए अर्थात् स्तम्भ और खिंचावट को दूर करने के लिए शामक औषधि अहिफेन या अहिफेन के योग ( Morphine ) का सूचीवेध दें या क्लोरलहाइड्रेट ( Chloral Hydrate ) ३० से ६० की मात्रा में अथवा ( Brymices ) दो ड्राम से एक औंस की मात्रा में दें। अथवा क्लोरोफार्म ( Chloroform ) और एमलनाइट्रेट ( Amyl Nitrate ) सुंघावें । विषतिन्दुकस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम्। मात्राविद्विर्नियुञ्जीत विमलं विषतिन्दुकम् ॥२०३॥ भा.टी.—विषमात्राविज्ञ वैद्य को चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती तक की मात्रा शुद्ध कुचला चूर्ण का प्रयोग करना चाहिए ॥२०३॥ विषतिन्दुकस्य आमयिकः प्रयोगः नवजीवनरसः कुचेलकं सुविमलं तोलकद्वयसंमितम्। लोहं द्वितोलकमितं रससिन्दूरकं तथा ॥२०४॥ पलार्द्धं त्र्यूषणञ्चैव समादायार्द्रकद्रवैः । विमर्द्य कारयेद्वैद्यो वटिका रक्तिकोन्मिताः ।.२०५॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नवजीवनसंज्ञकः । नवजीवनमेतद्धि ददाति नवजीवनम् । २०६॥ दीपनं पाचनञ्चैव बलसञ्जननं परम्। नाडीबलप्रजननं रतिशक्तिविवर्द्धनम् ॥२०७॥ अन्त्रशूलहरं कामं त्वाध्मानविनिवारणम् । मलबन्धहरं चैव तथातीसारनाशनम् ॥२०८॥ अर्द्धावभेदकहरं रक्तसञ्जननं परम्। शूलापहं मानसिकश्रमोद्भूतावसादनुत् ॥२०६॥ नवजीवनरसः-रससिन्दूरकं तथेति लोहसमानं द्वितोलकमित्यर्थः । नाड्यः ज्ञानवहाः चेष्टावहाश्च तासां बलं शक्तिं जनयतीति तथा ॥२०४-२०६॥ भा.टी.-शुद्ध कुचला दो तोला, लोहभस्म दो तोला, रससिन्दूर दो तोला