भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८५ साँठ, कालीमिर्च, तथा पिप्पली चूर्ण आधा पल लेकर सब को एकत्र खरल में अदरक के रस से खूब मर्दन करें जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको नवजीवन-रस नाम से कहा जाता है। यह नवजीवन रस सेवन करने से मनुष्य को नवीन जीवन प्रदान करता है। इसके सेवन से पाचक रस अधिक मात्रा में उत्पन्न होने से यह दीपक और आम रस को पचाने के कारण यह पाचक है। इसके सेवन से स्वस्थ शरीर में बल पैदा होता है। ज्ञानवाही तथा चेष्टावाही नाड़ियों की शक्ति बढ़ती है और स्मरण करने की शक्ति बढ़ती है। आंतों में होनेवाला शूल तथा आध्मान नष्ट होता है। इसके सेवन से मलबन्ध दूर होता है। और पुराने अतिसार में लाभ होता है। आधासीसी के दर्द में यह बहुत लाभ करता है और शरीर में रक्त की वृद्धि करता है और शरीर के किसी भाग में होनेवाले वातिक शूलों को तथा मान- सिक परिश्रम से उत्पन्न शिथिलता को दूर करता है ॥२०४-१०६॥ अग्नितुण्डीरसः अमृतं तोलकमितं जीरकञ्च फलत्रिकम् । रसेश्वरं सुविमलं बलिञ्चैव विडङ्गकम् ॥२१०॥ सौवर्चलं च सामुद्रं सौभाग्यं सैन्धवं तथा । सर्जिक्षारं यवक्षारं चित्रकं त्वजमोदिकाम् ॥२११॥ कुचेलकं सुविमलं सर्वेषां समभागिकम् । समादाय भिषग्वर्यो जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥२१२॥ निर्मापयेत्ततो यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिताः । नामतस्तु समाख्यातास्त्वग्नितुण्डीरसाह्वया ॥२१३॥ अग्नितुण्डीरसो ह्येषः दीपनः पाचनः परम् । अग्निमान्द्यप्रशमनो नाडीबलविवर्द्धनः ॥२१४॥ गुदामयप्रशमनस्तथाऽतीसारनाशनः । कटिपृष्ठसमुद्भूतां नाशयेद्वातवेदनाम् ॥२१५॥ अग्नितुण्डीरसः-अमृतं वत्सनाभः । रसेश्वरं पारदः । बलिर्गन्धकः ॥ भा.टी.-शुद्ध वत्सनाभ, जीरा, हरीतकी, बहेड़ा, आंवलाचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वायविडंगचूर्ण, सौवर्चलनमक, समुद्रनमक, सुहागा, सैंधानमक, सज्जिक्षार, यवक्षार, चित्रकमूल चूर्ण, अजमोदा चूर्ण, शुद्ध कुचलाचूर्ण; प्रत्येक सम