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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८५ साँठ, कालीमिर्च, तथा पिप्पली चूर्ण आधा पल लेकर सब को एकत्र खरल में अदरक के रस से खूब मर्दन करें जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको नवजीवन-रस नाम से कहा जाता है। यह नवजीवन रस सेवन करने से मनुष्य को नवीन जीवन प्रदान करता है। इसके सेवन से पाचक रस अधिक मात्रा में उत्पन्न होने से यह दीपक और आम रस को पचाने के कारण यह पाचक है। इसके सेवन से स्वस्थ शरीर में बल पैदा होता है। ज्ञानवाही तथा चेष्टावाही नाड़ियों की शक्ति बढ़ती है और स्मरण करने की शक्ति बढ़ती है। आंतों में होनेवाला शूल तथा आध्मान नष्ट होता है। इसके सेवन से मलबन्ध दूर होता है। और पुराने अतिसार में लाभ होता है। आधासीसी के दर्द में यह बहुत लाभ करता है और शरीर में रक्त की वृद्धि करता है और शरीर के किसी भाग में होनेवाले वातिक शूलों को तथा मान- सिक परिश्रम से उत्पन्न शिथिलता को दूर करता है ॥२०४-१०६॥ अग्नितुण्डीरसः अमृतं तोलकमितं जीरकञ्च फलत्रिकम् । रसेश्वरं सुविमलं बलिञ्चैव विडङ्गकम् ॥२१०॥ सौवर्चलं च सामुद्रं सौभाग्यं सैन्धवं तथा । सर्जिक्षारं यवक्षारं चित्रकं त्वजमोदिकाम् ॥२११॥ कुचेलकं सुविमलं सर्वेषां समभागिकम् । समादाय भिषग्वर्यो जम्बीराम्लेन मर्दयेत् ॥२१२॥ निर्मापयेत्ततो यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिताः । नामतस्तु समाख्यातास्त्वग्नितुण्डीरसाह्वया ॥२१३॥ अग्नितुण्डीरसो ह्येषः दीपनः पाचनः परम् । अग्निमान्द्यप्रशमनो नाडीबलविवर्द्धनः ॥२१४॥ गुदामयप्रशमनस्तथाऽतीसारनाशनः । कटिपृष्ठसमुद्भूतां नाशयेद्वातवेदनाम् ॥२१५॥ अग्नितुण्डीरसः-अमृतं वत्सनाभः । रसेश्वरं पारदः । बलिर्गन्धकः ॥ भा.टी.-शुद्ध वत्सनाभ, जीरा, हरीतकी, बहेड़ा, आंवलाचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वायविडंगचूर्ण, सौवर्चलनमक, समुद्रनमक, सुहागा, सैंधानमक, सज्जिक्षार, यवक्षार, चित्रकमूल चूर्ण, अजमोदा चूर्ण, शुद्ध कुचलाचूर्ण; प्रत्येक सम

भाग में लेकर खरल में एकत्र डालकर जम्बीरी निम्बू के रस से मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको अग्निस्तुण्डीरस के नाम से कहा जाता है। यह अग्निस्तुण्डी रस उत्तम दीपक और पाचक है। अग्निमान्द्य को नष्ट करता है। नाड़ियों की कार्यशक्ति को बढ़ाता है। अर्शरोग को शान्त करता और अतीसार को नष्ट करता है। कमर तथा पीठ में होनेवाली वेदनाओं को शान्त करता है ॥२१०-२१५॥ लक्ष्मीविलासो रसः कुचेलकं सुविमलं रसस्तोलकसम्मितम् । सुपुष्पितं च सौभाग्यं मरिचं चैव तन्मितम् ॥२१६॥ लोहं द्विकर्षप्रमितं गन्धेशौ द्वयेकभागिकौ । सर्वं सम्मेल्य यत्नेन भावयेदार्द्रकद्रवैः ॥२१७॥ वरीभूधात्रिकाभृङ्गेश्वरसेन च भावयेत् । निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटिका रक्तिकोन्मिता ॥२१८॥ समाख्यातो रसो लक्ष्मीविलास इति नामतः । तारुण्यलक्ष्मीमतुलां प्रददाति रसो ह्ययम् ॥२१९॥ रोगदुर्बलदेहानां कृशानां क्षीणरेतसाम् । देहपुष्टिकरः कामं तथा वीर्यविवर्द्धनः ॥२२०॥ बलवर्णकरो वृष्यो वह्निमान्द्यविनाशनः । रक्तसञ्जननश्चैव तथा लावण्यवर्द्धनः ॥२२१॥ लक्ष्मीविलासः—रसस्तोलकं षट् तोलकम्, लोहं ४ तो०, गन्धकः २ तो०, पारदः १ तो० । भूधात्रिका तामलकी ॥२१६-२२१॥ भा.टी.—शुद्ध कुचलाचूर्ण छः तोला, सुहागाखील छः तोला, कालीमिर्च चूर्ण छः तोला, लोहभस्म चार तोला, शुद्ध गन्धक दो तोला, शुद्ध पारद एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली कर लें। फिर इसमें अन्य औषधियाँ खरल में अदरक के रस से मर्दन करें, फिर इसको शतावर मुंडी, आंवला और भांगरे के स्वरस की तीन-तीन भावना देकर एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको “लक्ष्मी विलास” नाम से कहा जाता है। इस रस के सेवन से शरीर में अत्यधिक तरुणावस्था की शोभा बढ़ जाती है। रोग से दुर्बल हुए शरीरवालों, कृश, तथा नष्ट वीर्य मनुष्यों के लिये यह शारीरिक पुष्टि को उत्पन्न

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८७ करता और वीर्य की वृद्धि करता है। इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है। अग्निमान्द्य के विकार नष्ट हो जाते और शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और सुन्दरता बढ़ती है ॥२१६-२२१॥ शूलनिर्मूलनरसः त्र्यूषणं गन्धपाषाणं मरिचं शङ्खभस्मकम् । सैन्धवं रससिन्दूरं जीरकं चाम्लवेतसम् ॥२२२॥ सर्वार्द्धभागिकञ्चैव विमलं विषतिन्दुकम् । आदाय भिषजां वर्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा ॥२२३॥ विभाव्य कारयेद्यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । रसोऽयं तु समाख्यातः शूलनिर्मूलनाभिधः ॥२२४॥ दीपनः पाचनश्चायं वह्निमान्द्यप्रणाशनः । अतीसारग्रह णिकाविषूचीविनिवारणः ॥२२५॥ बलवर्णाकरो वृष्यो गुल्मामयनिषूदनः । रसोऽयं शूलदलने बहुशो दृष्टप्रत्ययः ॥२२६॥ शूलनिर्मूलनरसे—गन्धपाषाणं गन्धकम्। दृष्टप्रत्ययः निश्चितमनुभूत इत्यर्थः ॥२२६॥ भ.टी.—सोंठ, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध गन्धक, कालीमिर्च चूर्ण, शंखभस्म, सेन्धानमक, रससिन्दूर, जीरा चूर्ण, अमलवेत चूर्ण, प्रत्येक समभाग में लें। और सबसे आधा भाग शुद्ध कुचलाचूर्ण लेकर सबको एकत्र खरल में अदरक में सहिजने के रस के साथ मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक रत्ती की गोली बना लें। इसको "शूलनिर्मूलनरस" नाम से कहा जाता हैं। रस दीपन और पाचन होने से अग्निमान्द्य रोग को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त इसके सेवन से अतीसार ग्रहणी तथा विसूचिका रोग भी नष्ट होते हैं। पाचक शक्ति का वर्धक होने से इसके द्वारा शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती हैं और उत्पादक अंगों की शक्ति बढ़ जाती है। इसके कुछ दिन प्रयोगसे गुल्म रोग नष्ट हो जाता है। परन्तु वातिक शूल, विशेषतः उदरशूल को नष्ट करने में निश्चित अनुभूत औषधि है। ॥२२२–२२६॥ सुप्तिवातारिरसः कर्षैकप्रमितं शुद्धं विषतिन्दुकबीजकम् । समा कज्जलिका चैव समगन्धेशसाधिता ॥२२७॥

६८८ रसतरङ्गिणी त्र्यूषणं च पलाद्धं स्यान्निर्गुण्डीद्रवयोगतः। ब्रह्मबीजद्रवेणापि भावयेत्सप्तवारकम् ॥२२८॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटी गुञ्जाद्वयोन्मिता। रसोऽयं सुप्तिवातारेः सुप्तिवातनिषूदनः ॥२२६॥ सुप्तिवातारेः—समगन्धकपारदाभ्यां साधिता कज्जली च विषतिन्दुकबीजात् समाना ग्राह्या। ब्रह्मबीजद्रवेण पलाशत्रीजकषायेण। सुप्तिवातः वातकृतः स्वाप इवाङ्गानाम् ॥२२७-२२६॥ भा.टी.—शुद्ध कुचला चूर्ण दो तोला, समभाग पारद गन्धक की कज्जली दो तोला, सोंठ मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण आधा पल अर्थात् चार तोला लेकर एकत्र खरल में डाल इसको सात भावना निर्गुण्डी स्वरस की और सात भावना पलाश (ढाक) बीज कषाय की देकर दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको सुप्तिवा- तारिरस कहते हैं। यह सुप्तवात (सुन्नवाय) को नष्ट करता है ॥२२७-२२६॥ सारमेयविषापहो योगः विषतिन्दुकबीजं तु प्रत्यहं परिशीलितम्। निहन्ति कुक्कुरविषं खलु मासैकमात्रतः ॥२३०॥ भा.टी—शुद्ध कुचला चूर्ण को प्रतिदिन एक मास तक निरन्तर सेवन करने से पागल कुत्ते के काटने का विष नष्ट हो जाता है ॥२३०॥ वक्तव्य—अन्यत्र पागल कुत्ते के विष प्रभाव को नष्ट करने के लिए प्रतिदिन एक-एक कुचला बीज बढ़ाते हुए एक मास तक सेवन करने को लिखा है, परन्तु यह अधिक मात्रा है। विषतिन्दुकस्य बाह्यप्रयोगः विषतिन्दुकतैलम् विषतिन्दुकबीजं तु तौलकैकमितं शुभम्। तिलतैले तु विमले तोलकाष्टकसंमिते ॥२३१॥ मन्दाग्निना पचेत्तावद्यावदायाति रक्तताम्। एतत्संज्ञायते रम्यं विषतिन्दुकतैलकम् ॥२३२॥ विषतिन्दुकतैलन्तु भृशमभ्यङ्गयोजितम्। पक्षाघातादिकान् रोगान् विनिहन्त्यविकल्पतः ॥२३३॥ सारमेयविषापहो योगः—मासमात्रं नियमेन सेवितं कुचेलकं कुक्कुरविषं

४४ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८६ नाशयति । तन्त्रान्तरदर्शनात् क्रमवृद्धमात्रया सेवनीयम् । उक्तं हि—"कारस्क- रफलं सेव्यं क्रमवृद्धं दिने-दिने । सारमेयविषं हन्ति मासेन नहि संशयः ॥" इति । भा.टी.—कुचला बीज एक तोला लेकर आठ तोले शुद्ध तिल तैल में डाल- कर इस तेल को मन्द-मन्द अग्नि से तब तक पकायें जब तक कि कुचला बीज पककर लाल रंग का न हो जाय । बीज के लाल रंग का होने पर तैल को नीचे उतार लें । इस प्रकार यह कुचला तैल तैयार हो जाता है । इस तेल को शरीर में मालिश करने से पक्षाघात आदि वात रोग निश्चित दूर हो जाते हैं ॥२३४॥ वक्तव्य—शुद्ध कुचलाचूर्ण, लौंगचूर्ण, कर्पूर, सोंठ, दालचीनी, पीपला- मूल, प्रत्येक सम भाग में लेकर गोमूत्र के साथ एकत्र पीसकर लेप तैयार कर लें । इस लेप को माथे पर लगाने से आधा-सीसी की वेदना शान्त हो जाती है । अथ अहिफेनस्य नामानि आहिफेनमफेनञ्च निफेनमहिफेनकम् । अफूकं फणिफेनञ्च नागफेनञ्च तन्मतम् ॥२३५॥ भा.टी.—अहिफेन, अफेन, निफेन, अहिफेनक, आफूक, फणिफेन और नागफेन, ये सब नाम अफीम के कहे जाते हैं ॥२३५॥ अहिफेनस्य परिचयः खस्तिलस्य फलानां तु चीरणात्खलु दुग्धवत् । निर्यासो योऽभिनिर्याति अहिफेनः स एव हि ॥२३६॥ अहिफेनपरिचयः—खस्तिलस्येत्यादिना । यद्यपि केचित्—"समुद्रे चैव जाय- न्ते विषमत्स्याश्चतुर्विधाः। तेभ्यः फेनं समुत्पन्नमहिफेनं चतुर्विधम् ॥" "केचिद्वदन्ति सर्पाणां फेनं स्यादहिफेनकम् । धारणं श्वेतवर्णञ्च रक्तवर्णञ्च जारकम् ॥ सारणं पीतवर्णञ्च कृष्णवर्णञ्च मारणम् । विषवद्धयुत्तमं फेनं युज्यते रसकर्मणि" इत्याहुः। तत्त्वनर्गलंवचनमेव, तादृशपदार्थानुपलम्भात् । निघण्टुवर्णितगुणायोगाच्च खाख- सजातो निर्यास एव अहिफेनं सर्वसम्मतमिति निर्विवादम् । तदेतदाह—खस्तिलस्य तदाख्यक्षुपविशेषस्य, फलानां क्षुपलग्नानां हरितानामेव चरणात् लेखनादिति यावत्, "चीरं रेखाभेदो लेखनभेद" इति मेदिनी । चीरणं च लेखनयन्त्रविशेषेण सम्पाद्यते । लेखनयन्त्रं हि पञ्चषैस्तीक्ष्णाग्रैर्लोहफलकैरकत्र ईषदन्तरेण संयोजितैः सम्पन्नं भवति । सायं खस्तिलफलानि लिख्यन्ते, प्रातश्च निर्यासः शुष्कः विलि- ख्यैकत्रीक्रियते । दुग्धवत् दुग्धसदृशो यो निर्यासः अभिनिर्याति बहिः स्रवति तस्यैव नाम अहिफेनमिति ॥२३६॥

६६० रसतरङ्गिणी भा.टी.—खस्तिल के फलों को चीरने से जो दुग्ध उपलब्ध होता है उसे अफीम कहते हैं। सायंकाल में फलों में चीर लगाते हैं और सुबह सूर्योदय के पूर्व दुग्ध ग्रहण करते हैं ॥२३६॥ वक्तव्य—अहिफेन के विषय में अनेक प्रकार की कथायें लिखी हुई पायी जाती हैं। जैसे "समुद्रे चैव जायन्ते विषमत्स्याश्चतुर्विधाः। तेभ्यः फेनं समुत्पन्न- महिफेनं चतुर्विधम् ॥" "केचिद्वदन्ति सर्पाणां फेनं स्यादहिफेनकम् । धारणं श्वेत- वर्णाञ्च रक्तवर्णाञ्च जारकम् ॥ सारणं पीतवर्णाञ्च कृष्णवर्णाञ्च मारणम्। विषवद्द्युक्तमं फेनं युज्यते रसकर्मणि ॥" परन्तु ये सब बातें मिथ्या समझनी चाहिए। भारत में सर्वत्र अफीम की खेती की जाती है। बिहार प्रान्त में इसकी उपज अच्छी होती है। यह औषधियों में काम आती है। राजपूताना और मध्य भारत में होनेवाली अफीम को मालवा अफीम कहते हैं जो खाने के काम आती है। अफीम का क्षुप अर्थात् पोस्त का क्षुप वार्षिक (वर्ष में एक बार होनेवाला) २ से ४ फुट ऊँचा और शाखा रहित होता है। इसके कांड से रस निकलता है। इसके पत्ते लम्बे अण्डाकृति, कुछ-कुछ पक्षों में फटे हुए और दन्तुर होते हैं और फूल बड़े, श्वेत, कभी-कभी लाल और बैंगनी। इसको फली एक इञ्च व्यास और एक कोष्ठ की होती है। इसके बीज अनेक, श्वेत और सुन्दर तैलयुक्त होते हैं जिन्हें खशखश कहते हैं। पौधों की फलियों की तरुणावस्था में, रात्रि को एक औजार से सीधे ऊपर से नीचे समानान्तर चीर दिये जाते हैं, जिससे रस निकलकर जम जाता है, जो सवेरे इकट्ठा कर लिया जाता है। इन फलियों में जब तक रस निकलता रहता है चीरा देते रहते हैं। जलीय भाग उड़ जाने पर यह गाढ़ा हो जाता है। इसे कुछ पानी में घोल छान कर गाढ़ा कर लेते हैं, जो अफीम कही जाती है। अफीम पहिले तो नरम और भूरे रंग की होती है, परन्तु पीछे कठोर गहरी भूरी हो जाती है। यह गन्ध में तीव्र, स्वाद में तिक्त (कड़वी) और स्पर्श में कोमल होती है। अफीम गरम पानी में घुल जाती है और धूप से ढीली पड़ जाती है। इस को जलाने से कोयला नहीं बनता और धूप रहित जलती है। बाजार में यह प्रायः अशुद्ध अवस्था में मिलती है। अफीम में अनेक क्षारीय तत्त्व होते हैं जो लगभग १८ हैं। जिनमें से मुख्य Modphine ५ से ७%, Narcotine २ से ८%, Codeine २ से ७% प्रतिशत है।

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६१ जिसने अफीम को विषैली मात्रा में खा लिया हो वह मोह-निद्रा में पड़ा रहता है और पुकारकर जगाना कठिन होता है। इसकी त्वचा शीत स्पर्शी, मुख और ओष्ठ कुछ श्याम वर्ण, नाड़ी अतिशिथिल और मन्द चलती है। श्वास भी मन्द और विषम चलती है। नेत्र की पुतलियाँ संकुचित हो जाती हैं। अन्त में श्वासरोध के कारण मृत्यु हो जाती है। खायी हुई अफीम को बाहर निकालने के लिए राई या मदनफलचूर्ण को गरम जल में मिलाकर वमन देनी चाहिए। अथवा वमन के लिए ऐपोमा- र्फीन (Apomorphine) १/८ से १/२ यव मात्रा में सूचीवेध द्वारा देनी चाहिए। यदि अफीम खाये देर हो गयी हो और अफीम पक्वाशय में पहुँच गयी हो तो उसे ५, ५ मासे त्रिवृत्-चूर्ण देकर विरेचन देना चाहिए। हृदय की गति को उत्तेजित करने के लिए उत्तेजक द्रव्य जैसे चाय, काफी का तीव्र फाण्ट पिलाना या कस्तूरी और विषमुष्टि वारुणीसार पिलाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य उत्तेजक औषधियां जैसे ब्राण्डी, स्ट्रिक्नीन १/८० ग्रेन का सूचीवेध दें। और अमोनिया सुँघावें। हृदय को बल देने के लिए एट्रोपीन सल्फेट (Atropine sulphate) १/८० यव का सूचीवेध, या कनकासव, या वैले, डोला आसव ३० बूँद मात्रा में पुतली फैलने तक एक-एक घंटे पीछे देवें। खस्तिलनिर्यासस्य निर्मलीकरणम् खस्तिलस्य तु निर्यासं सलिले तु सुनिर्मले। सान्द्राय्य खलु यत्नेन वस्त्रपूतन्तु कारयेत् ॥२३७॥ निर्मलीकृतमेतत्तु खस्तिलद्रवतोयकम् । गव्यदुग्धसमायुक्तं पचेन्मन्दाग्नियोगतः ॥२३८॥ पाककालं सुविज्ञाय पाकविद्विषजां वरः। समाहरेत्प्रयत्नेन त्वफेनं निर्मलीकृतम् ॥२३९॥ खस्तिलनिर्यासनिर्मलीकरणप्रकारो निगदव्याख्यातः ॥२३७-२३६॥ भा.टी.—पोस्त डाटे से निकले हुए रस को स्वच्छ जल में घोलकर कपड़े में छान लें। इस प्रकार साफ किये हुए पोस्तद्रव (रस) को जल में थोड़ा गो-दूध मिलाकर उसे मन्द-मन्द अग्नि में पकायें। जब अच्छी तरह पक जांय तो उसे नीचे उतारकर रख लें, इस विधि से अफीम साफ हो जाती हैं ॥२३७-२३६॥ वक्तव्य—आज कल बाजार में मिलनेवाली अफीम में उसका भार बढ़ाने के लिए अनेक द्रव्यों के रस मिला दिये जाते हैं। अथवा धतूरे का

६६२ रसतरङ्गिणी स्वरस मिला दिया जाता है जिससे वह वास्तविक कार्य नहीं करती है और न उसका वास्तविक रंग ही देखने को मिलता है। अतः कच्ची अफीम को लेकर उसे उक्त विधि से अथवा अपक्व अफीम को अदरख रस की २१ भावना देकर काम में लाना चाहिए। खस्तिलनिर्यासनिर्मलीकरणस्य प्रयोजनम् विक्रीयेत विपण्यां यत्त्वफेनं खलु साम्प्रतम्। द्रव्यान्तरयोगाद्धूर्तादिभावितत्वाच्च गर्हितम् ॥२४०॥ खस्तिलस्य तु निर्यासमादायातो भिषग्वरः। स्वयं सुनिर्मलीकृत्य शोधयेच्च प्रयोजयेत् ॥२४१॥ अन्यद्रव्ययोगाद्धेतोः धत्तूरादिरसैर्भावितत्वाच्च विपणिषु उपलभ्यमानं नाभि- लषितसिद्धिकरमिति अपक्वमेव तदादाय तत्साध्यव्याधिषु प्रयोगार्थं निर्मलीकृत्य शोधयितव्यमिति भावः ॥२४०, २४१॥ भा.टी.—आज कल दुकानों में बिकनेवाली अफीम अनेक अन्य द्रव्यों के योग से या धत्तूरा रस क्रिया योग से मिली हुई होने के कारण खराब होती है। अतः वैद्य को अफीम लेकर स्वयं साफ करके शुद्ध करनी चाहिये ॥२४०, २४१॥ अहिफेनस्य शोधनम् निर्मलं त्वहिफेनं तु शृङ्गवेरस्य वारिणा। विभावितं सप्तवारं शुद्धिमायात्यनुत्तमम् ॥२४२॥ शोधनप्रकारः—अहिफेनं आर्द्रकजलेन सप्तधा भावितं शुध्यति इति। “अहिफेनं शृङ्गवेररसैर्भाव्यं त्रिसप्तधा। शुध्यत्युक्तेषु योगेषु योजयेत्तद्विधानतः” इति प्राञ्चः ॥२४२॥ भा.टी.—जल और गोदुग्ध से साफ की हुई अफीम को अदरख के स्वरस की सात भावना देकर सुखाकर रख लेने से अफीम अच्छी तरह शुद्ध हो जाती है ॥२४२॥ अहिफेनस्य गुणाः अहिफेनं सुतिक्तं तु निद्राजनकमुत्तमम्। ग्राहि चैव विशेषेण वेदनाविनिवारणम् ॥२४३॥ सन्निपातप्रशमनं तथा वमिनिषूदनम्। पुरातनं नवं वापि विनिहन्त्यतिसारकम् ॥२४४॥ निहन्त्यामाशयोद्भूतं क्षतमांसार्बुदव्यथाम्। मद्यपानोत्थशोथस्य व्यथाञ्चामाशयाश्रयाम् ॥२४५॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६३ अपानवायोर्भुक्तान्नबहिर्निःसारणात्मिकाम् । क्रियां विवृद्धां चपलां ह्रासयत्यविकल्पतः ॥२४६॥ प्रथमायामवस्थायामतीसारैकलक्षणाम् । विनिहन्ति विशेषेण विसूचीमतिदारुणाम् ॥२४७॥ सातिसारं सप्रलापं पर्याकुलमनिद्रया । निपातयेत्सन्निपातमान्त्रिकज्वरसंज्ञकम् ॥२४८॥ प्रवाहिकाप्रशमनं त्वन्त्रशूलविनाशनम् । मदात्ययहरं चैव तथोन्मादनिबर्हणम् ॥२४९॥ रजःशूलप्रशमनमस्थिभग्नव्यथापहम् । नवामवातशमनं हतमस्थिच्युतौ तथा ॥२५०॥ शुष्ककासप्रशमनं गर्भस्रावनिषूदनम् । राजयक्ष्मसमुद्भूतनिशास्वेदनिषूदनम् ॥२५१॥ हृद्धमन्योगतेः कामं मन्दीकरणकारणात् । अन्त्रोत्थं फुप्फुसोत्थं वा रक्तस्रावं व्यपोहति ॥२५२॥ वाताधिक्याद् बृहद्वेगं कफनिर्गमवर्जितम् । कण्ठकण्डूसमुत्थं वा कासं नाशयति द्रुतम् ॥२५३॥ नाडीनां धमनीनां च यस्माच्च हृदयस्य च । नैसर्गिकीं प्रवृद्धां वा गतिं मन्दयति द्रुतम् ॥२५४॥ तस्माद्धृदयरोगेषु रससन्त्रविचक्षणः । अहिफेनं प्रयुञ्जीत सावधानतया सदा ॥२५५॥ अथ अहिफेनस्य गुणाः-अहिफेनं सुतिक्तं अतितिक्तरसम्, उत्तमं निद्राज- नकम्, विशेषेण ग्राहि, वेदना पीडा व्यथेति यावत्, तस्या विनिवारणम्, नवः नवीनो य आमवातः, तस्य शमनम् ॥ २४३-२५५ ॥ भा.टी.-अफीम खाने में अत्यन्त कड़वी होती है। इसके सेवन से नींद आती है। यह विशेष रूप से ग्राही द्रव्य है और शरीर में होनेवाली वेदनाओं को दूर करती है। सन्निपात को शान्त करती तथा वमन को नष्ट करती है। नवीन अथवा पुरातन अतीसार को शान्त करती है। इसके सेवन से आमाशय में क्षत अथवा मांसाबुंद के कारण होनेवाली पीड़ा शान्त हो जाती है। अत्यधिक मद्यपान करने के कारण होनेवाली आमाशय शोथ पीड़ा को भी यह शान्त करती है। अपानवायु की भोजन को बाहर निकालनेवाली बढ़ी हुई शीघ्र

६६४ | रसतरङ्गिणी प्रवृत्ति को अफीम कम कर देती है । विसूचिका की प्रथमावस्था में होनेवालो एकमात्र अतीसार को यह शीघ्र शान्त करती है । आन्त्रिक ज्वर में अतीसार प्रलाप तथा निद्रा नाश होने पर अफीम या अफीम के योगों को देने से सब लक्षण मिट जाते हैं । इसके सेवन से मदात्यय तथा उन्मादरोग नष्ट हो जाते हैं । स्त्रियों को माहवारी के समय होने वाली शूल को तथा हड्डी के टूटने से होने- वाली व्यथा को अफीम शान्त करती है । नूतन आमवात को शान्त करती और और अस्थिच्युत (Dislocation) में लाभ करती है । यह सूखीवात की खाँसी को शान्त करती और होनेवाले गर्भस्राव तथा पात को रोकती है । राजयक्ष्मा रोग में रात्रि के समय आनेवाले पसीने को यह रोकती है । हृदय और धमनियों की गति को पर्याप्त मन्द करने के कारण अफीम आन्त्र तथा फुफ्फुसों से होने- वाले रक्तस्राव को रोक देती है । वायु की अधिकता के कारण तीव्रवेगयुक्त तथा कफरहित कास में अथवा कण्ठ में कण्डू जैसी होकर होनेवाले कास में अफीम के प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । क्योंकि अफीम नाड़ियों, धमनियों तथा हृदय की स्वाभाविक अथवा बढ़ी हुई गति को शीघ्र ही मन्द कर देती है । अतः वैद्य को हृदय के रोगों में बड़ी सावधानी के साथ अफीम का प्रयोग करना चाहिए ॥२४३-२५५॥ वक्तव्य—महास्रोतों पर मुख द्वारा दिये जाने पर अफीम का इस प्रकार प्रभाव देखा जाता है कि मुख, तालु, जिह्वा, गला, आमाशय और आंतों के स्राव सूख जाते हैं । अफीम इन अंगों के न केवल स्रावों को किन्तु इनकी गतियों और क्रियाओं को भी मन्द कर देती है, जिससे क्षुधा नष्ट हो जाती है और अग्नि मन्द पड़ जाती है तथा महास्रोत के किसी अंग में किसी तरह की वेदना हो तो वह भी शान्त हो जाती है । अफीम का उक्त प्रभाव आंतों पर अधिक स्पष्ट होता है, जिससे आँतों के स्वाभाविक स्राव और चेष्टाएँ मन्द पड़ जाती हैं, मलबन्ध हो जाता और यकृत् से होनेवाला पित्तस्राव कम पड़ जाता है । अतः अफीम उद्वर्त्तहर, शोषक, ग्राही और शूलहर है । अफीम को देने से श्वासोच्छ्वास क्रिया मन्द पड़ जाती है । यदि अत्यधिक मात्रा में अफीम दी जाय तो एक मिनट में १८ के स्थान पर केवल ३-४ श्वास ही रह जाते हैं । अतएव अफीम के विष में श्वास की मन्दता से ही मृत्यु होती है । साधारण मात्रा में अफीम श्वास नलियों की मांस पेशियों को शिथिल करती है जिससे

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६५ उनमें होनेवाला उद्वर्त्त कम हो जाता है और शुष्ककास को आराम आता है। अफीम का मुख्य प्रभाव नाड़ी मंडल पर होता है। थोड़ी मात्रा में अफीम देने से मस्तिष्क उत्तेजित होता है, जिससे अफीम खानेवाले को प्रसन्नता और आराम का अनुभव होता है। कई मनुष्य थोड़ी अफीम खाकर ही अपना काम ठीक कर सकते हैं। अफीम की इस उत्तेजना के पीछे मन्दता और उसके पीछे तन्द्रा और फिर निद्रा की अवस्था आती है। थोड़ी मात्रा में खाने पर केवल मन्दता की अवस्था तक ही प्रभाव होता है और शेष दोनों अवस्थाएँ नहीं आती हैं। मन्दता की अवस्था में श्रवण, दर्शन और स्पर्श की इन्द्रियां कुछ कुण्ठित हो जाती हैं। निद्रा और तन्द्रा की अवस्था में शरीर की सब प्रकार की शूल नष्ट हो जाती है। अफीम की अधिक मात्रा खाने पर प्रथम उत्तेजना की अवस्था क्षणिक ही होती है तथा शीघ्र ही निद्रा या मोह- निद्रा की अवस्थायें आ जाती हैं, जिससे मस्तिष्क की सब क्रियायें मन्द हो जाती हैं। पुतलियां संकुचित होकर कई बार सुई की नोक के बराबर हो जाती हैं। अतः अफीम नाड़ीमण्डल का उत्तेजक, शूलहर, निद्राजनक और मादक द्रव्य है। उत्तेजक प्रभाव बहुत थोड़ी देर रहता है, परन्तु पीछे मन्दता का प्रभाव ही स्थिर रहता है। अफीम का मांसपेशियों पर भी मन्दता रूप प्रभाव होता है, परन्तु अधिक मात्रा में दिये जाने पर भी मांस पेशियों में पूर्ण मन्दता नहीं आती है। अफीम की विषैली मात्रा खाये जानेपर भी रोगी को सहारा देकर उसकी टाँगों पर चला सकते हैं। अफीम देने से मूत्र की मात्रा घट जाती है। यह स्रावों के लिए शोषक है, परन्तु स्वेद और स्तन्य पर इसका शोषक प्रभाव कम होता है। इसके देने से यदि मूत्र के साथ खांड आती हो तो वह भी कम हो जाती है। अफीम का निष्क्रमण आंतों द्वारा होता है, अतः इसका विशेष प्रभाव आंतों पर ही होता है। अहिफेनस्य निषेधः न बालेषु न वृद्धेषु मधुमेहप्रपीडिते । शीतपादकरायाञ्च विषूच्यां खलु नैव च ॥२५६॥ न श्लैष्मिके तथा कासे प्रचुरश्लेष्मनिर्गमे । अहिफेनं वृक्कशोथे प्रयुञ्जीत न कर्हिचित् ॥२५७॥ अहिफेनसेवननिषेधः न बालेष्विति। हृदयगत्यवसादकत्वादिगुणयोगात् विषप्रभाववत्त्वाच्च बालादिष्वस्य सेवननिषेधः। श्लैष्मिककासे तु शोषकत्वात् । वृक्कशोथे च मूत्रग्राहित्वात् इत्यवधेयम् ॥२५६, २५७॥

६६६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—अफीम बालकों को बूढों को तथा मधुमेह के रोगियों को नहीं देनी चाहिए। हाथ पैर ठंडे होने की अवस्था में विसूचिका में भी अफीम नहीं देनी चाहिए और अधिक निकलनेवाले श्लैष्मिक कास में तथा वृक्कशोथ होने पर अफीम का सेवन नहीं करना चाहिए ॥२५६-२५७॥ वक्तव्य—बच्चों पर अफीम का विषैला प्रभाव थोड़ी मात्रा में भी हो जाता है। अतः एक वर्ष तक के बच्चे को अफीम नहीं देनी चाहिए। यदि अफीम देना आवश्यक हो तो आधा बूँद अहिफेनासव दे सकते हैं। कितनों को अफीम की थोड़ी मात्रा भी अनुकूल नहीं पड़ती है। निरन्तर अफीम देने से इसकी साधारण मात्रा स्वाभाविक हो जाती है, अतः इसकी मात्रा बढ़ानी पड़ती है। तीव्र शूलों में रोगी अफीम की अधिक मात्रा को सह लेता है। अफीम के साथ बैलेडोना ( Balladona ) या धतूरा मिला देने से इसका मलबन्धक प्रभाव कम हो जाता है। हृदय फुफ्फुस के रोगों में अफीम का प्रयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि यह हृदयगति का अवसादक होती है। बाह्यप्रयोगे अहिफेनस्य गुणाः अहिफेनं विशेषेण खलु बाह्यप्रयोगतः। फुप्फुसच्छदशोथघ्नं त्वन्त्रावरणशोथनुत् ॥२५८॥ विविधोत्थानसम्भूतां विविधस्थानसंश्रयाम्। तथा विविधसंस्थानां वेदनां विनिहन्त्यलम् ॥२५९॥ अभिष्यन्दप्रशमनं कर्णशूलनिबर्हणम्। कृमिदन्तोत्थशूलघ्नं त्वामवातापहं तथा ॥२६०॥ गुदामयहरञ्चैव पायुस्थविदरापहम्। व्रणपीडाप्रशमनं नाडीनामवसादनम् ॥२६१॥ बहिःप्रयोगे अहिफेनगुणाः—फुप्फुसच्छदः फुप्फुसावरणी श्लैष्मिकी कला, तत्र जातं शोथं हन्ति तथा अन्त्राणामावरककलाशोथञ्च हरतीति। विविधं नाना- प्रकारं यत् उत्थानं निदानं तस्माज्जाताम्, शरीरे विविधस्थानेषु अङ्गप्रत्यङ्गेषु समाश्रिताम्, विविधसंस्थानां बहुविधरूपाम्, वेदनां पीडां व्यथामिति यावत्। अभिष्यन्दः अक्षिरोगविशेषः। पायुस्थो विदरश्चीरः तस्य विनाशकम्। नाडीनां अवसादनं दौर्बल्यकरम् ॥२५८-२६१॥ भा.टी.—अफीम बाह्य प्रयोग में विशेष रूप से फुफ्फुस शोथ (निमोनिया) तथा अन्त्रावरण शोथ (पेरिटोनाइटिस) को नष्ट करती है। इस तरह बाह्य-

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६८७ प्रयोग से अनेक विध कारणों से होनेवाली तथा शरीर के विभिन्न प्रदेशों की अनेक प्रकार की वेदनाओं को भी नष्ट करती है । नेत्र दुखने पर इसके लेप से लाभ होता है । कान में शूल होने पर इसके योग कान में डालने से शूल को नष्ट करते हैं । दाँतों में कीड़ा लगने से होनेवाले शूल तथा आम वातिक शूल में भी इसका लेप तथा प्रयोग किया जाता है । बवासीर तथा गुदा के फटने पर इसके लेप लगाये जाते हैं । व्रणों में होनेवाली पीड़ा को यह शान्त करती है और नाड़ियों की उत्तेजना को भी शान्त करती है ॥ २५६-२६१ ॥ अहिफेनस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं शुभम् । अहिफेनं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ २६२ ॥ भा.टी.-रोग तथा रोगी का बल, अवस्था, देश काल आदि को पूर्ण विचार करके अफीम को चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा तक देना चाहिए ॥ २६२ ॥ अहिफेनस्य आमयिकः प्रयोगः पिण्डखर्जूरसंयुक्तं फणिफेनं तु शीलितम् । नाशयत्यचिरादेव गर्भस्रावमसंशयम् ॥ २६३ ॥ अर्कमूलत्वचाचूर्णसंयुक्तं त्वहिफेनकम् । शीलितं त्वचिरादेव विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ २६४ ॥ एलालाक्षारजोयुक्तं फणिफेनं तु शीलितम् । रक्तस्रावं निहन्त्याशु फुफ्फुसोत्थं सुदारुणम् ॥ २६५ ॥ रसाञ्जनसमायुक्तं शिलाघृष्टं त्वफेनकम् । योजितं विनिहन्त्याशु त्वभिष्यन्दभवां रुजम् ॥ २६६ ॥ भा.टी.-गर्भस्राव में अफीम को पिण्ड खजूर में मिलाकर देने से गर्भ- स्राव शीघ्र ही रुक जाता है । प्रवाहिका में अफीम को आक की जड़ की छाल के चूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है । फेफड़ों से होने- वाले भयंकर रक्तस्राव को रोकने के लिए अफीम को छोटी इलायची तथा लाक्षाचूर्ण में मिलाकर प्रयोग करने से शीघ्र रक्तस्राव बन्द हो जाता है। आँख दुखने की पीड़ा को शान्त करने के लिए अफीम को रसौंत के साथ जल में घिस कर नेत्रों के बाहर लेप लगाने से शीघ्र पीड़ा बन्द हो जाती है ॥२६३-२६६॥ वेदनान्तकरासः अहिफेनं सुविमलं माषकत्रयसंमितम् ।

६६८ रसतरङ्गिणी घनसारं समं तुल्यां पारसीकयवानिकाम् ॥ २६७ ॥ रससिन्दूरकञ्चैव रसमाषकसंमितम् । आदाय पेषयेद्यत्नाद् विजयाद्रवयोगतः ॥ २६८ ॥ निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिकाद्वयसंमिता । रसोऽयं तु समाख्यातो वेदनान्तकसंज्ञकः ॥ २६६ ॥ रसोऽयमम्भसा युक्तो विनिहन्ति विशेषतः । विविधोत्थानसंस्थानां वेदनां विविधाश्रयाम् ॥ २७० ॥ वेदनान्तकरसः—सर्वविधव्यथानाशाय प्रशस्ततमः । घनसारं कर्पूरम् । रस- सिन्दूरं रसमाषकं षण्माषकम् ॥ २६७-२७० ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त विधि से शुद्ध की हुई अफीम तीन माशे, खुरासानी अजवायनचूर्ण छः मासे, रससिन्दूर छः मासे लेकर सब को एकत्र खरल में डालकर भाँग की पत्तियों के रस मर्दन करके दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें । इसको वेदनान्तक रस नाम से कहा जाता है । इस रस को जल के साथ सेवन कराने के अनेकविध कारणजन्य और अनेकविध लक्षणयुक्त शरीर के विविध प्रदेश की वेदना शान्त होती है ॥ २६७-२७० ॥ निद्रोदयरसः अहिफेनं सुविमलं रसमाषकसंमितम् । तन्मितां च तुगाक्षीरीं रससिन्दूरकं तथा ॥ २७१ ॥ धात्रीचूर्णं तोलकैकं समादाय भिषग्वरः । विभावयेत्प्रयत्नेन विजयावारिणा त्रिधा ॥ २७२ ॥ निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिद्वितयसंमिताः । रसोऽयं तु समाख्यातो निद्रोदयसमाह्वयः ॥ २७३ ॥ तत्तद्गदैर्वेदनयार्दितानां पुंसां सुखस्वापकरोऽतिवेलम् । यथार्थनामा समुदीरितोऽयं रसस्तु निद्रोदयनामधेयः ॥ २७४ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध की हुई अफीम छः मासा, वंशलोचन चूर्ण छः मासा, रससिन्दूर छः मासा, आँवलों का चूर्ण एक तोला लेकर सबको एकत्र खरल में डालकर भाँग की पत्तियों के स्वरस से तीन भावना देवें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें । इसको निद्रोदय रस के नाम से कहा जाता है । यह रस विभिन्न रोगों की पीड़ा से दुःखी रोगियों को शीघ्र

चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६६ ही सुख की निद्रा से लाभ करता है, अतः इस रस का निद्रोदय नाम देना बहुत ही उचित है ॥ २७१-२७४ ॥ सिन्दूरभूषणरसः अहिफेनं सुविमलं रसमाषकसंमितम् । तत्समं सुमृतं स्वर्णं घनसारञ्च तन्मितम् ॥ २७५ ॥ रुचिरं रससिन्दूरं तोलकद्वयसंमितम् । एलाबीजं तुगाक्षीरीं पृथक् तोलकसंमिताम् ॥ २७६ ॥ समादाय ततो मुस्तक्वाथेन परिपेष्य तु । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिकाद्वयसंमिता ॥ २७७ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना सिन्दूरभूषणः । महौषधमिदं ख्यातमतीसारप्रणुत्तये ॥ २७८ ॥ भा.टी.—शुद्ध की हुई अफीम छः मासा, स्वर्णभस्म छः मासा, कपूर छः मासा, उत्तम रससिन्दूर दो तोला, छोटी इलायची बीजचूर्ण एक तोला, वंश- लोचनचूर्ण एक तोला लेकर सब को एकत्र खरल में मोथाकषाय के साथ मर्दन करें। गोली बनाने योग्य हो जाने पर इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको सिन्दूरभूषण रस कहते हैं। अतीसार रोग को नष्ट करने के लिए यह रस बहुत उत्तम ॥ २७५-२७८ ॥ हर्षोदया वटी फणिफेनं सुविमलं तोलकैकमितं शुभम् । कस्तूरिकाञ्च कर्पूरं पृथङ् माषत्रयोन्मितम् ॥ २७९ ॥ मरिचं रससिन्दूरं पृथक् तोलकसंमितम् । जातीफलं जातिपत्रीं कुङ्कुमं शुद्धहिङ्गुलम् ॥ २८० ॥ समाहरेत्पृथग्वैद्यो रसमाषकसंमितम् । विजयास्वरसेनेह त्रिवारं खलु भावयेत् ॥ २८१ ॥ कारयेद्वटिका यत्नाद् गुञ्जाद्वितयसंमिता । वटिकेयं समाख्याता बुधैर्हर्षोदयाभिधा ॥ २८२ ॥ बलवर्णाग्निजननी प्रमदामदमर्दिनी । वीर्यसंस्तम्भनी ह्येषा विशेषेण प्रकीर्तिता ॥ २८३ ॥ ताम्बूलवीटिकोपेता वटीयं परिशीलिता । मासमात्रप्रयोगेण ददाति विपुलं बलम् ॥ २८४ ॥

७०० रसततरङ्गिणी पृथुसन्तानिकोपेतं प्रतप्तं माहिषं पयः। तथा माषान्नपिष्टानि सेव्येतप्रत्यहं पुमान् ॥ २८५ ॥ स्मरस्मयस्मेरविलोचनाभिर्विलासिनीभिः परितर्जितानाम् । यतः प्रहर्षं प्रकरोति यूनां हर्षोदया सार्थकनामिकाऽतः ॥ २८६ ॥ हर्षोदया वटी—जातीफलादिहिङ्गुलान्तानां पृथक् षण्माषकाः। पृथुसन्ता- निका स्थूलं क्षीरसरम् ॥ २७६-२८६ ॥ भा.टी.—शुद्ध की हुई अफीम एक तोला, उत्तम कस्तूरी तीन मासे, कपूर तीन मासे, कालीमिर्चचूर्ण एक तोला, रससिन्दूर एक तोला, जायफलचूर्ण, जावित्रीचूर्ण, केशर, शुद्ध हिंगुल; प्रत्येक ६, ६ मासे लेकर सबको एकत्र खरल में डाल भाँग के पत्तों की स्वरस से तीन भावना दें। जब गोली बंधने योग्य हो जाय तो इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको हर्षोदया वटी कहते हैं। इसके सेवन से शरीर में बल, वर्ण तथा पाचक अग्नि की वृद्धि होती है। इन गोलियों के सेवन से पुरुष मदमस्त स्त्री की मस्ती को चूर कर सकता है। विशेषकर यह गोलियाँ वीर्यस्तम्भन करने के काम आती है। इन गोलियों को पान के बीड़े में रखकर एक मास तक निरन्तर सेवन करने से शरीर में अत्यन्त बल वृद्धि होती है। इस वटी के सेवनकाल में मलाईवाला भैंस का दूध तथा उड़दकी पिष्ठी (पीठी) की बनी हुई अमृती, हलवा आदि चीजें खानी चाहिए ॥ २७६-२८६ ॥ अहिफेनासवः अहिफेनं सुविमलं तोलकत्रयसंमितम् । पञ्चाशत्तोलकमितां मृतसञ्जीवनीं सुराम् ॥ २८७ ॥ समादाय भिषग्वर्यः काचकुप्यां तु विन्यसेत । ततः काचपिधानेन रोधयेत् कूपिकामुखम् ॥ २८८ ॥ ततः कूपीं सुनिभृते स्थापयेत् सप्तवासरम् । अहिफेनासवो नाम्ना समाख्यातो भिषग्वरैः ॥ २८६ ॥ अहिफेनासवः—मृतसञ्जीवनी सुरा तन्त्रान्तरेषु ख्यातनिर्माणा। मात्रा प्रमाणं चास्य ५ बिन्दुभ्यः १५ बिन्दुपर्य्यन्तम् ॥ २८७-२८६ ॥ भा,टी.—शुद्ध अफीम तीन तोला, मृतसञ्जीवनी सुरा पचास तोला लेकर एक काँच की शीशी में डालकर शीशी में काँच का डाट लगाकर बन्द कर दें। अब शीशी किसी सुरक्षित स्थान में सात दिन तक रखी रहे। सात दिन के बाद आसव तैयार हो जायगा। इसको वैद्य लोग अहिफेनासव नाम से कहते हैं ॥ २८७-२८६ ॥

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०१ वक्तव्य—अहिफेनासव को (Tincture opium) कहते हैं और इसको अहिफेनवारुणीसार या अहिफेनासुत भी कह सकते हैं । मृतसञ्जीवनी सुरा का योग और निर्माण भैषज्यरत्नावली में विस्तृत रूप से लिखा हुआ है । उसके अभाव में रेक्टीफाइड स्प्रिट में भी इसको बनाया जा सकता है । अस्य गुणाः विविधोत्थानसम्भूतातीसारविनिषूदनः । कर्णशूलप्रशमनो दन्तशूलनिबर्हणः ॥२६०॥ अस्थिभग्नादिसम्भूतां तथास्थिच्युतिसम्भवाम् । वेदनां बहुहेतूत्थां विनिहन्त्यतिसत्वरम् ॥२६१॥ विविधोत्थानजातानां वेदनानां निवृत्तये । महौषधमिदं ख्यातं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥२६२॥ भा.टी.—उक्त अहिफेनासव विधि कारणजन्य अतीसार को दूर करता है । कानकी पीड़ा तथा दांत की पीड़ा को इसके सेवन से आराम आता है । इसी तरह हड्डी टूटने या हड्डी के अपने स्थान से हटने पर होनेवाली पीड़ा तथा अन्यान्य कारणों से होनेवाली पीड़ा में अहिफेनासव सेवन से शीघ्र आराम आता है । इसी तरह शरीर के किसी स्थान पर किसी कारण होनेवाली वेदना को शान्त करने के लिए रसशास्त्र में अहिफेनासव उत्तम औषधि है ॥२६०-२६२॥ अस्य मात्रा आरभ्य शरबिन्दुभ्यस्तिथिबिन्दुमितं परम् । अहिफेनासवं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥२६३॥ भा.टी.—इस अहिफेनासव की पूर्ण मात्रा पाँच बूँद से लेकर पन्द्रह बूँद तक समझनी चाहिए ॥२६३॥ अहिफेनासवस्य आमयिकः प्रयोगः अहिफेनासवोऽयन्तु मात्रया परिशीलितः । विविधोत्थानसम्भूतं नूतनं वा पुरातनम् ॥२६४॥ सुदारुणमतीसारमतीसारैकलक्षणम् । विषूचीं च निहन्त्याशु यथा सूर्यस्तमस्ततिम् ॥२६५॥ बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण निक्षिप्तः कर्णयोरयम् । अत्यल्पमात्रयैवेह कर्णशूलं व्यपोहति ॥२६६॥ अहिफेनासवे सक्तं तूलं तु कृमिदन्तके । न्यस्तं नातिचिरादेव वेदनां हन्ति तद्भवाम् ॥२६७॥

अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः-अतीसारैकलक्षणामिति विषूचीविशेषणं प्रयोग- योग्यतानिर्देशार्थम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥२६४-२६७॥ भा.टी—उक्त अहिफेनासव को मात्रापूर्वक सेवन करने से विविध कारणों से उत्पन्न पुरातन अथवा नूतन भयंकर अतीसार तथा तीव्र एवं एकमात्र अतीसार लक्षणयुक्त विसूचिका रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । बिन्दुक्षेपक यन्त्र के द्वारा इसको बहुत थोड़ी मात्रा में कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो जाती है । अहिफेनासव में रूई को तर करके कीड़ा लगे हुए दाँत के छेद में भरने से उसकी वेदना शीघ्र शान्त हो जाती है ॥२६४-२६७॥ मंगलोदया वटी फणिफेनं सुविमलं माषकैकमितं शुभम् । उत्तमं घनसारं च सप्तमाषकसंमितम् ॥२६८॥ सम्पेष्य वारिणा यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । कारयेद्भिषजां वर्यो रसतन्त्रविचक्षणः ॥२६९॥ नामतस्तु समाख्याता वटिका मङ्गलोदया । प्रलापाक्षिप्रणुत्त्यर्थं सता हिततमा परम् ॥३००॥ मङ्गलोदया वटी-अहिफेनं शुद्धं १ मा०, घनसारं कर्पूरम् ७ मा०,स्पष्टमन्यत्॥ भा.टी.—शुद्ध अफीम एक मासा, उत्तम कपूर सात मासा लेकर दोनों को एकत्र जल से पीसकर एक-एकरत्ती की गोलियाँ बना लें । इन गोलियों को मंगलोदया वटिका कहते हैं । सन्निपातज्वरादि में प्रलाप, निद्रानाश आदि उपद्रव तीव्र होने पर इस वटी के प्रयोग से उत्तम लाभ होता है ॥२६८-३००॥ वेदनान्तकमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं ग्रहतोलकसंमितम् । फणिफेनञ्च विमलं ग्रहमाषकसंमितम् ॥३०१॥ फणिफेनमितञ्चैव खलु हेरम्बभूषणम् । समादाय भिषग्वर्यः खल्वे सम्मेलयेत्ततः ॥३०२॥ काचकुप्यां निधायाथ पिधानेन निरोधयेत् । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०३॥ वेदनां शमयत्याशु गुदाङ्कुरसमाश्रयाम् । पायुस्थविद्रदोद्भूतां वेदनाञ्चातिदारुणाम् ॥३०४॥

गुदांकुरप्रशमनः पायुस्थविदरान्तकः । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०५॥ वेदनान्तकमलहरः—सिक्थतैलं पूर्वोक्तपरिभाषं नवतोलकम्, शुद्धमहि- फेनञ्च ६ मा०, हेरम्भभूषणं सिन्दूरम् ६ मा०, विदरश्रीरः ॥३०१-३०५॥ भा.टी.—स्वच्छ मोम का तेल नौ तोला, शुद्ध अफीम नौ मासे, सिन्दूर नौ मासे, सबको एकत्र एक खरल में मिला लें। अब इसको एक कांच की शीशी में भरकर डाट लगा दें। इसको वेदनाहर मलहम नाम से कहा जाता है। यह मलहम लेप करने से बवासीर के मस्सों का पीड़ा को शान्त करता है। गुदा फटने के कारण होनेवाली भयंकर पीड़ा में भी यह लेप करने से बहुत लाभ करता है। यह मलहम महषों पर लेप करने से उनको सुखा देता और गुदविकार को भर देता है ॥३०१-३०५॥ अथ जयपालस्य नामानि जयपालश्च जेपालो रेचकः सारकस्तथा । विभेदनो मलद्रावी स एव परिकीर्तितः ॥३०६॥ भा.टी—जयपाल, जेपाल, रेचक, सारक, विभेदन, मलद्रावी, ये सब नाम जमाल गोटे के कहे जाते हैं ॥३०६॥ जयपालस्य परिचयः नात्युच्छ्रितो नातिह्रस्वो दन्तीजातीयकस्तरुः । अधुना तु विशेषेण देशे पञ्चनदाह्वये ॥३०७॥ तथैव सिंहलद्वीपे द्वीपेष्वन्येषु जायते । बीजं तस्य भिषग्वर्यैर्जयपाल इति स्मृतः ॥३०८॥ दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य तु यद्यपि । परं तीव्रतरा शक्तिर्दृश्यते मलभेदने ॥३०९॥ जयपालपरिचयः “जयपालो दन्तबीजम्” इति भावप्रकाशीयनिघण्टु- व्यवहारभ्रान्तिनिरासाय । तदेतदाह “दन्तजातीयकस्तरुः इति । अपि च “दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य” इत्यपि भेदकं लक्षणमस्य दन्तीबीजात् । केचित्तु बृहद्दन्तीबीजं जयपालमाहुः । वस्तुतस्तु जयपालो दन्तीबीजात् भिन्न एवेति जयपालनाम्नैव प्रसिद्ध्यति वर्तमाने जगति ॥३०७-३०९॥ भा.टी.—जमालगोटा न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा दन्ती जाति का एक वृक्ष होता है, जो आजकल पञ्जाब प्रान्त में अधिकतर पाया जाता है।

इसके अतिरिक्त यह सिंहलद्वीप तथा अन्य द्वीपों में भी पाया जाता है । इसी वृक्ष के बीजों को जयपाल नाम से कहा जाता है । यद्यपि जयपाल के बीज बड़ी दन्तीबीजों की अपेक्षा छोटे होते हैं । परन्तु इसमें बड़ी दन्तीबीजों की अपेक्षा दस्त लाने की शक्ति बहुत तेज होती है ॥३०७-३०६॥ वक्तव्य— जयपाल को इंगलिश में Corlan और लेटिन में Croton Tiglium कहते हैं । यह एक छोटा सदा हरा प्रायः सर्वत्र पाया जानेवाला वृक्ष है । इसके पत्र २ से ४ इञ्च लम्बे, आगे से नुकीले तथा कुछ-कुछ दन्तुर होते हैं । फूलों के गुच्छे २ से ३ इञ्च लम्बे, शाखाओं के सिरों पर होते हैं । इसका फूल १ इञ्च व्यास का, बीज आधा से ३/४ इञ्च लम्बे अण्डाकार के होते हैं । जयपाल के बीजों में हरा, पीला, दाहक, गन्धयुक्त ३० से लेकर ४०% तैल होता है । इसे Croton oil कहते हैं । यह ईथर, मद्यसार, क्लोरोफार्म तथा जैतून के तेल में घुलनशील होता है तथा तीव्र क्षोभक और रेचक ( दस्तावर ) होता है । जयपालस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जयपालस्य बीजानि नवानि तु समाहरेत् । बाह्यत्वचमपाकृत्य द्विधा खलु विभेदयेत् ॥३१०॥ हरिद्वर्णां नातिदीर्घां रसनां तु परित्यजेत् । पोट्टल्यामथ विन्यस्य दोलायन्त्रे विधानतः ॥३११॥ गव्यदुग्धे प्रयत्नेन यामैकं स्वेदयेत्ततः । एवं त्रिवारं सुस्विन्नो जयपालो विशुद्ध्यति ॥३१२॥ अस्य प्रथमे शोधनप्रकारे—त्रिवारं स्वेदनविधानं स्नेहाधिक्यनिवृत्तये ॥ भा.टी.— जमालगोटे के नूतन बीजों को लेकर उनके बाहरी छिलके अलग करके बीच से निकलनेवाली मींगी को चाकू से बीच में फाड़ लें । फाड़ने पर मींगी के बीच में से एक छोटी सी हरे रंग की जीभ सी होगी उसे अलग फेंक दें । अब इस जीभरहित जयपाल बीज मज्जा को एक कपड़े में बाँध पोटली बनाकर दोलायन्त्र में गाय का दूध डालकर एक पहर तक पकायें । इस प्रकार तीन बार गोदुग्ध में दोलायन्त्र द्वारा स्वेदन करने से जयपाल शुद्ध हो जाता है ॥३१०-३१२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः त्वग्रसज्ञाविरहितं जयपालस्य बीजकम् । वस्वंशटङ्कणोपेतं पोट्टल्यां रोधयेद् दृढम् ॥३१३॥