रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८८ रसतरङ्गिणी त्र्यूषणं च पलाद्धं स्यान्निर्गुण्डीद्रवयोगतः। ब्रह्मबीजद्रवेणापि भावयेत्सप्तवारकम् ॥२२८॥ निर्मापयेत्प्रयत्नेन वटी गुञ्जाद्वयोन्मिता। रसोऽयं सुप्तिवातारेः सुप्तिवातनिषूदनः ॥२२६॥ सुप्तिवातारेः—समगन्धकपारदाभ्यां साधिता कज्जली च विषतिन्दुकबीजात् समाना ग्राह्या। ब्रह्मबीजद्रवेण पलाशत्रीजकषायेण। सुप्तिवातः वातकृतः स्वाप इवाङ्गानाम् ॥२२७-२२६॥ भा.टी.—शुद्ध कुचला चूर्ण दो तोला, समभाग पारद गन्धक की कज्जली दो तोला, सोंठ मिर्च तथा पिप्पलीचूर्ण आधा पल अर्थात् चार तोला लेकर एकत्र खरल में डाल इसको सात भावना निर्गुण्डी स्वरस की और सात भावना पलाश (ढाक) बीज कषाय की देकर दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको सुप्तिवा- तारिरस कहते हैं। यह सुप्तवात (सुन्नवाय) को नष्ट करता है ॥२२७-२२६॥ सारमेयविषापहो योगः विषतिन्दुकबीजं तु प्रत्यहं परिशीलितम्। निहन्ति कुक्कुरविषं खलु मासैकमात्रतः ॥२३०॥ भा.टी—शुद्ध कुचला चूर्ण को प्रतिदिन एक मास तक निरन्तर सेवन करने से पागल कुत्ते के काटने का विष नष्ट हो जाता है ॥२३०॥ वक्तव्य—अन्यत्र पागल कुत्ते के विष प्रभाव को नष्ट करने के लिए प्रतिदिन एक-एक कुचला बीज बढ़ाते हुए एक मास तक सेवन करने को लिखा है, परन्तु यह अधिक मात्रा है। विषतिन्दुकस्य बाह्यप्रयोगः विषतिन्दुकतैलम् विषतिन्दुकबीजं तु तौलकैकमितं शुभम्। तिलतैले तु विमले तोलकाष्टकसंमिते ॥२३१॥ मन्दाग्निना पचेत्तावद्यावदायाति रक्तताम्। एतत्संज्ञायते रम्यं विषतिन्दुकतैलकम् ॥२३२॥ विषतिन्दुकतैलन्तु भृशमभ्यङ्गयोजितम्। पक्षाघातादिकान् रोगान् विनिहन्त्यविकल्पतः ॥२३३॥ सारमेयविषापहो योगः—मासमात्रं नियमेन सेवितं कुचेलकं कुक्कुरविषं