रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ६८७ करता और वीर्य की वृद्धि करता है। इसके सेवन से शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती है। अग्निमान्द्य के विकार नष्ट हो जाते और शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और सुन्दरता बढ़ती है ॥२१६-२२१॥ शूलनिर्मूलनरसः त्र्यूषणं गन्धपाषाणं मरिचं शङ्खभस्मकम् । सैन्धवं रससिन्दूरं जीरकं चाम्लवेतसम् ॥२२२॥ सर्वार्द्धभागिकञ्चैव विमलं विषतिन्दुकम् । आदाय भिषजां वर्यः शृङ्गवेरस्य वारिणा ॥२२३॥ विभाव्य कारयेद्यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । रसोऽयं तु समाख्यातः शूलनिर्मूलनाभिधः ॥२२४॥ दीपनः पाचनश्चायं वह्निमान्द्यप्रणाशनः । अतीसारग्रह णिकाविषूचीविनिवारणः ॥२२५॥ बलवर्णाकरो वृष्यो गुल्मामयनिषूदनः । रसोऽयं शूलदलने बहुशो दृष्टप्रत्ययः ॥२२६॥ शूलनिर्मूलनरसे—गन्धपाषाणं गन्धकम्। दृष्टप्रत्ययः निश्चितमनुभूत इत्यर्थः ॥२२६॥ भ.टी.—सोंठ, पिप्पलीचूर्ण, शुद्ध गन्धक, कालीमिर्च चूर्ण, शंखभस्म, सेन्धानमक, रससिन्दूर, जीरा चूर्ण, अमलवेत चूर्ण, प्रत्येक समभाग में लें। और सबसे आधा भाग शुद्ध कुचलाचूर्ण लेकर सबको एकत्र खरल में अदरक में सहिजने के रस के साथ मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी एक रत्ती की गोली बना लें। इसको "शूलनिर्मूलनरस" नाम से कहा जाता हैं। रस दीपन और पाचन होने से अग्निमान्द्य रोग को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त इसके सेवन से अतीसार ग्रहणी तथा विसूचिका रोग भी नष्ट होते हैं। पाचक शक्ति का वर्धक होने से इसके द्वारा शरीर में बल और वर्ण की वृद्धि होती हैं और उत्पादक अंगों की शक्ति बढ़ जाती है। इसके कुछ दिन प्रयोगसे गुल्म रोग नष्ट हो जाता है। परन्तु वातिक शूल, विशेषतः उदरशूल को नष्ट करने में निश्चित अनुभूत औषधि है। ॥२२२–२२६॥ सुप्तिवातारिरसः कर्षैकप्रमितं शुद्धं विषतिन्दुकबीजकम् । समा कज्जलिका चैव समगन्धेशसाधिता ॥२२७॥