रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 727, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंअस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः-अतीसारैकलक्षणामिति विषूचीविशेषणं प्रयोग- योग्यतानिर्देशार्थम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥२६४-२६७॥ भा.टी—उक्त अहिफेनासव को मात्रापूर्वक सेवन करने से विविध कारणों से उत्पन्न पुरातन अथवा नूतन भयंकर अतीसार तथा तीव्र एवं एकमात्र अतीसार लक्षणयुक्त विसूचिका रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । बिन्दुक्षेपक यन्त्र के द्वारा इसको बहुत थोड़ी मात्रा में कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो जाती है । अहिफेनासव में रूई को तर करके कीड़ा लगे हुए दाँत के छेद में भरने से उसकी वेदना शीघ्र शान्त हो जाती है ॥२६४-२६७॥ मंगलोदया वटी फणिफेनं सुविमलं माषकैकमितं शुभम् । उत्तमं घनसारं च सप्तमाषकसंमितम् ॥२६८॥ सम्पेष्य वारिणा यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता । कारयेद्भिषजां वर्यो रसतन्त्रविचक्षणः ॥२६९॥ नामतस्तु समाख्याता वटिका मङ्गलोदया । प्रलापाक्षिप्रणुत्त्यर्थं सता हिततमा परम् ॥३००॥ मङ्गलोदया वटी-अहिफेनं शुद्धं १ मा०, घनसारं कर्पूरम् ७ मा०,स्पष्टमन्यत्॥ भा.टी.—शुद्ध अफीम एक मासा, उत्तम कपूर सात मासा लेकर दोनों को एकत्र जल से पीसकर एक-एकरत्ती की गोलियाँ बना लें । इन गोलियों को मंगलोदया वटिका कहते हैं । सन्निपातज्वरादि में प्रलाप, निद्रानाश आदि उपद्रव तीव्र होने पर इस वटी के प्रयोग से उत्तम लाभ होता है ॥२६८-३००॥ वेदनान्तकमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं ग्रहतोलकसंमितम् । फणिफेनञ्च विमलं ग्रहमाषकसंमितम् ॥३०१॥ फणिफेनमितञ्चैव खलु हेरम्बभूषणम् । समादाय भिषग्वर्यः खल्वे सम्मेलयेत्ततः ॥३०२॥ काचकुप्यां निधायाथ पिधानेन निरोधयेत् । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०३॥ वेदनां शमयत्याशु गुदाङ्कुरसमाश्रयाम् । पायुस्थविद्रदोद्भूतां वेदनाञ्चातिदारुणाम् ॥३०४॥