रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगुदांकुरप्रशमनः पायुस्थविदरान्तकः । मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०५॥ वेदनान्तकमलहरः—सिक्थतैलं पूर्वोक्तपरिभाषं नवतोलकम्, शुद्धमहि- फेनञ्च ६ मा०, हेरम्भभूषणं सिन्दूरम् ६ मा०, विदरश्रीरः ॥३०१-३०५॥ भा.टी.—स्वच्छ मोम का तेल नौ तोला, शुद्ध अफीम नौ मासे, सिन्दूर नौ मासे, सबको एकत्र एक खरल में मिला लें। अब इसको एक कांच की शीशी में भरकर डाट लगा दें। इसको वेदनाहर मलहम नाम से कहा जाता है। यह मलहम लेप करने से बवासीर के मस्सों का पीड़ा को शान्त करता है। गुदा फटने के कारण होनेवाली भयंकर पीड़ा में भी यह लेप करने से बहुत लाभ करता है। यह मलहम महषों पर लेप करने से उनको सुखा देता और गुदविकार को भर देता है ॥३०१-३०५॥ अथ जयपालस्य नामानि जयपालश्च जेपालो रेचकः सारकस्तथा । विभेदनो मलद्रावी स एव परिकीर्तितः ॥३०६॥ भा.टी—जयपाल, जेपाल, रेचक, सारक, विभेदन, मलद्रावी, ये सब नाम जमाल गोटे के कहे जाते हैं ॥३०६॥ जयपालस्य परिचयः नात्युच्छ्रितो नातिह्रस्वो दन्तीजातीयकस्तरुः । अधुना तु विशेषेण देशे पञ्चनदाह्वये ॥३०७॥ तथैव सिंहलद्वीपे द्वीपेष्वन्येषु जायते । बीजं तस्य भिषग्वर्यैर्जयपाल इति स्मृतः ॥३०८॥ दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य तु यद्यपि । परं तीव्रतरा शक्तिर्दृश्यते मलभेदने ॥३०९॥ जयपालपरिचयः “जयपालो दन्तबीजम्” इति भावप्रकाशीयनिघण्टु- व्यवहारभ्रान्तिनिरासाय । तदेतदाह “दन्तजातीयकस्तरुः इति । अपि च “दन्तीबीजात् क्षुद्रतरं बीजमस्य” इत्यपि भेदकं लक्षणमस्य दन्तीबीजात् । केचित्तु बृहद्दन्तीबीजं जयपालमाहुः । वस्तुतस्तु जयपालो दन्तीबीजात् भिन्न एवेति जयपालनाम्नैव प्रसिद्ध्यति वर्तमाने जगति ॥३०७-३०९॥ भा.टी.—जमालगोटा न बहुत बड़ा और न बहुत छोटा दन्ती जाति का एक वृक्ष होता है, जो आजकल पञ्जाब प्रान्त में अधिकतर पाया जाता है।