भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 725

७०० रसततरङ्गिणी पृथुसन्तानिकोपेतं प्रतप्तं माहिषं पयः। तथा माषान्नपिष्टानि सेव्येतप्रत्यहं पुमान् ॥ २८५ ॥ स्मरस्मयस्मेरविलोचनाभिर्विलासिनीभिः परितर्जितानाम् । यतः प्रहर्षं प्रकरोति यूनां हर्षोदया सार्थकनामिकाऽतः ॥ २८६ ॥ हर्षोदया वटी—जातीफलादिहिङ्गुलान्तानां पृथक् षण्माषकाः। पृथुसन्ता- निका स्थूलं क्षीरसरम् ॥ २७६-२८६ ॥ भा.टी.—शुद्ध की हुई अफीम एक तोला, उत्तम कस्तूरी तीन मासे, कपूर तीन मासे, कालीमिर्चचूर्ण एक तोला, रससिन्दूर एक तोला, जायफलचूर्ण, जावित्रीचूर्ण, केशर, शुद्ध हिंगुल; प्रत्येक ६, ६ मासे लेकर सबको एकत्र खरल में डाल भाँग के पत्तों की स्वरस से तीन भावना दें। जब गोली बंधने योग्य हो जाय तो इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको हर्षोदया वटी कहते हैं। इसके सेवन से शरीर में बल, वर्ण तथा पाचक अग्नि की वृद्धि होती है। इन गोलियों के सेवन से पुरुष मदमस्त स्त्री की मस्ती को चूर कर सकता है। विशेषकर यह गोलियाँ वीर्यस्तम्भन करने के काम आती है। इन गोलियों को पान के बीड़े में रखकर एक मास तक निरन्तर सेवन करने से शरीर में अत्यन्त बल वृद्धि होती है। इस वटी के सेवनकाल में मलाईवाला भैंस का दूध तथा उड़दकी पिष्ठी (पीठी) की बनी हुई अमृती, हलवा आदि चीजें खानी चाहिए ॥ २७६-२८६ ॥ अहिफेनासवः अहिफेनं सुविमलं तोलकत्रयसंमितम् । पञ्चाशत्तोलकमितां मृतसञ्जीवनीं सुराम् ॥ २८७ ॥ समादाय भिषग्वर्यः काचकुप्यां तु विन्यसेत । ततः काचपिधानेन रोधयेत् कूपिकामुखम् ॥ २८८ ॥ ततः कूपीं सुनिभृते स्थापयेत् सप्तवासरम् । अहिफेनासवो नाम्ना समाख्यातो भिषग्वरैः ॥ २८६ ॥ अहिफेनासवः—मृतसञ्जीवनी सुरा तन्त्रान्तरेषु ख्यातनिर्माणा। मात्रा प्रमाणं चास्य ५ बिन्दुभ्यः १५ बिन्दुपर्य्यन्तम् ॥ २८७-२८६ ॥ भा,टी.—शुद्ध अफीम तीन तोला, मृतसञ्जीवनी सुरा पचास तोला लेकर एक काँच की शीशी में डालकर शीशी में काँच का डाट लगाकर बन्द कर दें। अब शीशी किसी सुरक्षित स्थान में सात दिन तक रखी रहे। सात दिन के बाद आसव तैयार हो जायगा। इसको वैद्य लोग अहिफेनासव नाम से कहते हैं ॥ २८७-२८६ ॥