भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६६ ही सुख की निद्रा से लाभ करता है, अतः इस रस का निद्रोदय नाम देना बहुत ही उचित है ॥ २७१-२७४ ॥ सिन्दूरभूषणरसः अहिफेनं सुविमलं रसमाषकसंमितम् । तत्समं सुमृतं स्वर्णं घनसारञ्च तन्मितम् ॥ २७५ ॥ रुचिरं रससिन्दूरं तोलकद्वयसंमितम् । एलाबीजं तुगाक्षीरीं पृथक् तोलकसंमिताम् ॥ २७६ ॥ समादाय ततो मुस्तक्वाथेन परिपेष्य तु । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिकाद्वयसंमिता ॥ २७७ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो नाम्ना सिन्दूरभूषणः । महौषधमिदं ख्यातमतीसारप्रणुत्तये ॥ २७८ ॥ भा.टी.—शुद्ध की हुई अफीम छः मासा, स्वर्णभस्म छः मासा, कपूर छः मासा, उत्तम रससिन्दूर दो तोला, छोटी इलायची बीजचूर्ण एक तोला, वंश- लोचनचूर्ण एक तोला लेकर सब को एकत्र खरल में मोथाकषाय के साथ मर्दन करें। गोली बनाने योग्य हो जाने पर इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको सिन्दूरभूषण रस कहते हैं। अतीसार रोग को नष्ट करने के लिए यह रस बहुत उत्तम ॥ २७५-२७८ ॥ हर्षोदया वटी फणिफेनं सुविमलं तोलकैकमितं शुभम् । कस्तूरिकाञ्च कर्पूरं पृथङ् माषत्रयोन्मितम् ॥ २७९ ॥ मरिचं रससिन्दूरं पृथक् तोलकसंमितम् । जातीफलं जातिपत्रीं कुङ्कुमं शुद्धहिङ्गुलम् ॥ २८० ॥ समाहरेत्पृथग्वैद्यो रसमाषकसंमितम् । विजयास्वरसेनेह त्रिवारं खलु भावयेत् ॥ २८१ ॥ कारयेद्वटिका यत्नाद् गुञ्जाद्वितयसंमिता । वटिकेयं समाख्याता बुधैर्हर्षोदयाभिधा ॥ २८२ ॥ बलवर्णाग्निजननी प्रमदामदमर्दिनी । वीर्यसंस्तम्भनी ह्येषा विशेषेण प्रकीर्तिता ॥ २८३ ॥ ताम्बूलवीटिकोपेता वटीयं परिशीलिता । मासमात्रप्रयोगेण ददाति विपुलं बलम् ॥ २८४ ॥