रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५ चतुर्विंशस्तरङ्गः ७०५ स्वेदयेद् दोलिकायन्त्रे द्वियामं गव्यदुग्धतः । इत्थं स्विन्नस्तु जैपालः शुद्धिमभ्यात्यनुत्तमाम् ॥३१४॥ द्वितीयः प्रकारः-अष्टमांशटङ्कणेनेपयुक्तः, टङ्कणं हि रूक्षत्वात् स्नेहाधिकम- पाकरोति । रसज्ञेति बीजदलमध्यस्थितः हरिद्वर्णाऽङ्कुरः जिह्वाकृतिमत्त्वात् तदर्था- भिधायकैः शब्दैरभिधीयते ॥३१३, ३१४॥ भा.टी.—छिलका और जिह्वा रहित जमालगोटे के बीजमज्जा में उससे आठवाँ भाग सुहागा मिलाकर उसको कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें, अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गोदुग्ध डालकर छः घण्टे तक स्वेदन करें। इस विधि से भी जयपाल अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥३१३, ३१४॥ तृतीयः शोधनप्रकारः जयपालं त्वग्रसज्ञारहितं पोट्टलीगतम् । दोलायन्त्रे तु यामैकं स्वेदयेद् गव्यदुग्धतः ॥३१५॥ सम्पेष्य खल्वे मूलेषु खर्परेषु प्रलेपयेत् । विज्ञाय विगतस्नेहं जयपालं समाहरेत् ॥३१६॥ न्यसेद्वा यत्नतो मध्ये मषीशोषकपत्रयोः । एवं तु विगतस्नेहो रेचकः शुद्धिमाप्नुयात् ॥३१७॥ तृतीयः प्रकारः-नूतनखर्परेषु लेपाद् विगतस्नेहम् । स्नेहापनयनञ्च विरेकाति- योगदाहोत्क्लेशादिराहित्याय । मषीशोषकपत्रं "Blotting paper" इत्याङ्ग- लभाषाप्रसिद्धं मषीशोषणायोपयुज्यमानं कागजम् । रेचकः जयपालः ॥३१५-३१७॥ भा.टी.—जयपाल बीजों के छिलके और जिह्वा निकालकर एक कपड़े में बाँधकर दोलायन्त्र में गोदुग्ध के साथ तीन घंटे तक पकायें। तीन घंटे के बाद पोटली को खोलकर उसकी मज्जा को खरल अथवा सिल पर अच्छी तरह बारीक पीसकर पीठी-सी बना लें। अब पीठी को एक नये कोरे घड़े के बाहरी पेंदे पर पतला-पतला लेप कर दें। जब इसका तेल सूख जाय तो इसे खुरचकर इकट्ठा कर लें। अथवा कोरा घड़ा न मिल सके तो उक्त पीठी को दो ब्लाटिंग पेपर (Blotting paper) के बीच में एक दिन रखें। जब चिक- नाहट रहित हो जाय तो निकालकर काम में लायें। यदि स्नेह बहुत मालूम पड़े तो पुनः ब्लाटिंग पेपरों के बीच में रख तेल को खुशक कर लें। इस तरह भी जयपालबीज शुद्ध हो जाते हैं ॥३१५-३१७॥