रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०६ रसतरङ्गिणी जयपालस्य गुणाः जयपालो मतस्तिक्तो विरेचनकरः परम् । जलोदरप्रशमनो नवज्वरनिबर्हणः ॥३१८॥ कृमिहारी कुष्ठहरो वातश्लेष्मनिषूदनः । वान्तिकृत्पित्तजननो वृश्चिकादिविषप्रणुत् ॥३१६॥ भा.टी.—जयपालबीज रस में कड़वे होते हैं । इसके सेवन से दस्त आते हैं । इसको जलोदर में सञ्चित जल को निकालने के लिए सेवन कराया जाता है । इसी तरह नव ज्वरों में इसको देने से विरेचन होकर ज्वरविष निकल जाने से ज्वर कम हो जाता है । उदरकृमियों को मारने के लिए इसको दिया जाता है जिससे वे मरकर विरेचन द्वारा बाहर निकल आते हैं । कुष्ठ रोगों में पित्त- जन्य रक्तविकृति को इसके द्वारा नष्ट करने से आराम आता है । यह बाह्य प्रयोग में वात तथा कफप्रकोप शामक है । इसकी अधिक मात्रा वमन ले आती है । इसके प्रयोग से पित्त अधिक मात्रा में निकलता है और बिच्छू आदि के दंश- स्थान पर इसको लगाने से उसका जहर नष्ट हो जाता है ॥३१८, ३१६॥ जयपालस्य मात्रा अष्टमांशाद्रक्तिकाया रक्तिकाचरणांशिकम् । जयपालं प्रयुञ्जीत भेषजैः सह योजितम् ॥३२०॥ जयपालमात्रा—रक्तिकाया अष्टमांशात् चतुर्थांशपर्यन्तम् । जयपालो हि प्रायशो न केवलमुपयुज्यते दाहशूलादिव्यापत्तिकरत्वात् । अतस्तदुत्थविकारानु- त्पत्त्यर्थं टङ्कणशुण्ठ्यादिभिर्भेषजैः सहोपयोज्यः । अत एवोक्तं भेषजैः सह योजितमिति ॥३२०॥ भा.टी.—शुद्ध जयपालबीजमज्जा को अन्य औषधियों के साथ मिलाकर रत्ती का आठवां भाग लेकर रत्ती के चतुर्थांश भाग तक की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए ॥३२०॥ जयपालस्थ आमयिकः प्रयोगः । इच्छाभेदी रसः टङ्कणं मरिचं सूतं गन्धकं विश्वभेषजम् । समाहरेद्भिषग्वर्यस्तोलकैकमितं पृथक् ॥३२१॥ विशुद्धं जयपालं च तोलकत्रयसंमितम् । समादाय सुमम्पेष्य सार्द्धगुञ्जैकसंमिताः ॥३२२॥ वटिकाः कारयेद्वैद्यो द्विगुञ्जाप्रमितास्तथा ।