रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० रसतरङ्गिणी आमाशय तथा पक्वाशयशोथ पीड़ितों को और गुदभ्रंश, आँतों में शोथयुक्त बद्ध- गुदोदर, आन्त्रावरककलाशोथ रोग में सेवन नहीं कराना चाहिए ॥३४०, ३४१॥ अथ धत्तूरस्य नामानि धत्तूरः कितवोन्मत्तौ धूर्तश्च कनकाभिधः । शठश्च कण्टकफलः कीर्तितः शिवशेखरः ॥ ३४२ ॥ भा.टी.—धत्तूर, कितव, उन्मत्त, धूर्त, स्वर्ण-नामयुक्त, शठ, कण्टक- फल तथा शिवशेखर, ये सब नाम धत्तूरे कहे जाते हैं । धत्तूरस्य परिचयः धत्तूरः क्षुपजातीयः सेकण्टकफलस्तथा । सुलभो, भिद्यते चायं पुष्पवर्णविभेदतः ॥ ३४३ ॥ धत्तुराः सर्व एवैते मताः समगुणान्विताः । विशेषतस्तु सर्वेषु कृष्णपुष्पो गुणाधिकः ॥ ३४४ ॥ पत्रं मूलं फलं बीजं तथा मृदुदलद्रवः । प्रयुज्यते विशेषेण धत्तूरस्य भिषग्वरैः ॥ ३४५ ॥ अयन्तूत्तरोपक्रमः—कनकाभिधः सुवर्णनामा । शिवशेखरः शिवपूजासु तद्व्यवहारात् ॥ ३४३–३४५ ॥ भा.टी.—धत्तूरा क्षुप जाति की औषधि है । इसके फलों पर काँटे से उगे होते हैं और यह प्रायः सर्वत्र पाया जाता है । फूलों के रंग में भिन्नता के कारण इसके कई भेद होते हैं । परन्तु प्रायः सभी प्रकार के धत्तूरे एक ही गुण- वाले होते हैं, किन्तु काले फूलवाला धत्तूरा अन्यों की अपेक्षा अधिक गुण- वाला होता है । औषधिकार्य में वैद्य लोग धत्तूरे के पत्र, मूल, बीज तथा कोमल पत्रस्वरस को विशेष रूप से काम में लेते हैं ॥ ३४३–३४५ ॥ वक्तव्य—धत्तूरा गरम प्रदेशों में उगनेवाला १ से २ फुट ऊँचा वार्षिक एक क्षुप है । इसके पत्ते ३ से ६ इंच लम्बे, त्रिकोण, अण्डाकृति, मूल पर गोल, दोनों पार्श्वविषम, पूर्णाधार या कुछ दन्तुर होते हैं । इसके फूल सफेद या काले बड़े-बड़े घंटाकार, फल छोटे सेव जितने, काँटों से ढके हुए, बीज फल में बहुत भरे हुए होते हैं । इसका एक भेद बेलेडोना है । बेलेडोना तथा Hysocyamus के पत्तों से धत्तूर के पत्र बहुत मिलते हैं । इसमें भेद इतना है कि बेलेडोना का पत्ता कम झुर्रियों वाला तथा Hysocyamus का पत्ता लोमश होता है ।