रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्लेषण—धतूरे Hysocpamine, Hysocine तथा Atropine तीन क्षारीय तत्त्व होते हैं। ये तत्त्व अन्य भागों की अपेक्षा बीज में अधिक पाये जाते हैं। उक्त तीन तत्त्वों में से Atropine नामक तत्त्व मद्यसार, क्लोरोफार्म, ईथर में घुल जाता है, किन्तु जल में नहीं घुलता है। धत्तूरबीजानां प्रथमः शोधनप्रकारः धत्तूरबीजान्यदाय पोट्टल्यां रोधयेत्ततः । स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे गव्यदुग्धेन यामकम् ॥३४६॥ संस्वेद्य क्षालयेदुष्णतोयेन तु ततो भिषक् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४७॥ गोदुग्धे गोमूत्रे वा यामैकं दोलया स्वेदनाच्छुध्यन्ति धत्तूरबीजानि । “धत्तूर- बीजं गोमूत्रे चतुर्र्यामोषितं पुनः कथितं निस्तुषं कृत्वा शुद्धं योगेषु योजयेत्” ऽइति हि स्मरन्ति प्राञ्चः ॥३४६, ३४७॥ भा.टी.—धतूरे के बीजों को एक कपड़े की पोटली में बांधकर दोलायन्त्र में गोदुग्ध भरकर उसमें तीन घंटे तक स्वेदन करें। तीन घंटे के बाद पोटली से धत्तूरबीजों को निकाल गरम पानी से धो लें। इस विधि से शुद्ध धत्तूरबीजों को निःशंक काम में ला सकते हैं ॥३४६, ३४७॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः नवानि धूर्त्तबीजानि दोलिकायन्त्रयोगतः । स्वेदयेद् गव्यमूत्रेण यामैकं पोट्टलीगतम् ॥३४८॥ खल्वेऽथ खलु सम्पेष्य वस्त्रपूतं तु कारयेत् । इत्थं शुद्धानि बीजानि वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३४६॥ भा.टी.—नूतन धत्तूरे को लेकर गोमूत्र में दोला विधान से पकाकर धूप में सुखा कपड़े में छानकर रख लें। फिर इसे निर्भय होकर प्रयोग करें ॥३४८, ३४६॥ धत्तूरस्य गुणाः धत्तूरः कटुकश्चोष्णस्तथा शोथनिषूदनः । कृमिघ्नः कुष्ठशमनो विशेषाज्ज्वरनाशनः ॥३५०॥ परं त्वग्दोषशमनस्तथा कण्डूतिकापहः । भ्रमकृन्मोहजननः समाख्यातो भिषग्वरैः ॥३५१॥ धत्तूरगुणाः—मोहजनकः, मोहो वैचित्यं तज्जनकः। स्पष्टमन्यत् ॥३५०, ३५१॥