रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१४ रस्तरङ्गिणी अथवा सन्निपातजन्य आक्षेप तथा प्रलाप में इसके सेवन से आराम आता है। सन्निपात ज्वर की अवस्था में जब रोगी बिछौने से उठ-उठकर भागने की चेष्टा करता है तो ऐसी दशा में धतूरा अथवा धतूरे के योग शीघ्र लाभ करते हैं। स्त्री को प्रसव होने के बादवाले मूत्ररोध अथवा सन्निपात ज्वर में होनेवाले मूत्ररोध में धतूरा योगों से शीघ्र लाभ होता है। वातिकनाड़ियों की दुर्बलता के कारण उत्पन्न तमकश्वास में जब श्वास लेने में रोगी की छाती में संकोच हो रहा हो और रोगी जोर-जोर से कराह रहा हो तो धत्तूरयोगों से शीघ्र लाभ दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त धत्तूर कफप्रकोपजन्य अथवा कफपित्तप्रकोपजन्य अथवा वातकफजन्य ऊर्ध्व जत्रु रोगों को विशेष रूप से नष्ट करता है। धतूरा ग्रन्थिक- ज्वर-( Plague ) जन्य, कक्ष-( बगल )-वंक्षण तथा कण्ठस्थ ग्रन्थियों की शोथ और ग्रन्थिकज्वर में बाह्याभ्यन्तर प्रयोग से लाभ करता है ॥ ३५२-३६६ ॥ वक्तव्य—यदि त्वचा पर धत्तूर के लेप लगाये जावें तो स्थानिक शूल और शोथ कम हो जाते हैं। इसके लगाने से स्थानिक स्राव भी सूख जाते हैं। स्तनों पर इसके लगाने से स्तनों से दूध निकलना बन्द हो जाता है या कम हो जाता है। जिस स्थान पर स्वेद अधिक आता हो इसका लेप लगाने से स्वेद बन्द हो जाता है। शूल तथा स्रावों को कम करने का कारण यह है कि ये धत्तूरलेप संज्ञावाहिनियों तथा स्रावों को उत्तेजक वातनाड़ियों के सिरों को निश्चेष्ट कर देते हैं। ये यूका लिक्षा तथा दद्रु आदि कृमियों को भी नष्ट करते हैं। मुख द्वारा धत्तूर का प्रयोग करने से शरीर की सब्र संज्ञावाहिनियों के सिरे कुछ निःसंज्ञ हो जाते हैं। अतः यदि शरीर के किसी भाग पर शूल हो तो वह मन्द हो जाता है अर्थात् यदि आंत, मूत्रमार्ग आदि में किसी प्रकार की शूल हो तो वह मन्द हो जाती है। मुख द्वारा अन्तः प्रयोग में धत्तूर या धत्तूर के योग स्रावों को भी सुखाते हैं। मुख और गला सूख जाता त्वचा तथा शुक्र का स्राव भी बन्द हो जाता है। श्वासनलियों का उद्धर्त अर्थात् दमा हो तो वह शान्त हो जाता है। इसके देने से हृदय तथा नाड़ी की प्रतिमिनट शक्ति बढ़ती है तथा इनकी शक्ति भी कुछ बढ़ जाती है। अतः धत्तूर हृद्य है। धतूरे को नेत्रों में डालने से नेत्र का शूल शान्त होता है और पुतलियाँ फैल जाती हैं। धत्तूर का विष- मज्वर पर विशेष प्रभाव होता है। धत्तूर के अधिक मात्रा में खाये जाने पर मुख सूख जाता है। निगलने में कठिनता होती है, त्वचा सूख जाती और मूत्र का स्राव बन्द हो जाता है। पुतली