भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७१८ रसतरङ्गिणी करके एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको उन्मादगजांकुश रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप के उन्मादरोग में काम आता है और ज्वरों को भी नष्ट करता है ॥ ३८३-३८५ ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिका धत्तूरस्य फलं त्वेकं तथैत्र विषतिन्दुकम् । तोलकं प्रमितञ्चैव चूर्णितं कृष्णजीरकम् ॥ ३८६ ॥ सह्रासारं मोचरसं कृष्णजीरकभागिकम् । समादाय स्नुहीपत्ररसन परिमर्दयेत् ॥ ३८७ ॥ वर्तिकाः कारयेद्वैद्यो माषकत्रयसंमिताः । ग्रन्थिकज्वरसम्भूतग्रन्थिशोथनिवारिकाः ॥ ३८८ ॥ वर्तिकैका शिलायां तु सङ्घृष्य विमलाम्भसा । प्रलिप्ता शमयत्याशु ग्रन्थिशोथं सुदारुणम् ॥ ३८९ ॥ दिने वारद्वयं वापि वारत्रयमथापि वा । सङ्घृष्य वर्तिकामेकां लेपयेद्विषजां वरः ॥३९० ॥ ग्रन्थिशोथनिवारिका वर्तिः—तथैवेत्येकसङ्ख्याकमेव । सहसारः कुमारीसारः “मुसव्वर” इति ख्यातः ॥ ३८६-३९० ॥ भा.टी.—धतूरे का एक फल, कुचलाबीज एक, कालाजीराचूर्ण एक तोला, एलुआ (मुसव्वर), मोचरस, प्रत्येक को एकं तोला लेकर सबको एकत्र सेहुँड़ के दूध के साथ खूब मर्दन करें। जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी तीन-तीन मासे की बत्तियाँ लें। इसको ग्रन्थिशोथहर वर्तिका कहते हैं। एक बत्ती को लेकर साफ पत्थर में स्वच्छ जल के साथ घिसकर इसका लेप करने से शीघ्र ही भयंकर ग्रन्थिशोथ मिट जाता है। दिन में दो बार अथवा तीन बार एक बत्ती को जल से घिसकर लेप करना चाहिए ॥ ३८६-३९० ॥ वक्तव्य—धतूरबीज, कालीमिर्च, कपूर, अफीम तथा सोयाबीज, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र खरल में बकरी के दूध से मर्दन करें। इसकी मोटी गाढ़ी पीठी सी बनाकर इसको बार-बार शिर के आधे भाग में लेप करने से भयंकर अर्धावभेदक शूल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। अथ भंगाया नामानि भङ्गा भङ्गी मातुलानी मादिनी मातिका तथा । मातुली विजया तन्द्राकारिणी बहुवादिनी ॥ ३९१ ॥