रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७१७ नष्ट हो जाता है । किसी प्रकार की बाह्यशोथजन्य पीड़ा को शान्त करने के लिए धत्तूरपत्र तथा अफीम को जल से पीसकर शोथ के ऊपर लेप करने से शीघ्र शान्त हो जाता है ॥ ३६६-३७८ ॥ प्रलापान्तकरसः धत्तूरबीजं विमलं नवमाषकसंमितम् । रसेश्वरं गन्धकं च पृथक् तोलकसंमितम् ॥ ३७९ ॥ कटुत्रिकं च सौभाग्यं पृथक् तोलकसंमितम् । आदाय पेषयेद्यत्नात् कामं निम्बूकवारिणा ॥ ३८० ॥ निर्मापयेत्ततो युक्त्या वटिका रक्तिकोन्मिताः । रसोऽयं तु समाख्यातः प्रलापान्तकसंज्ञकः ॥ ३८१ ॥ विशेषतो मतोऽयं तु प्रलापपरिकृन्तनः । दीपनः पाचनश्चैव वह्निमान्द्यप्रणाशनः ॥ ३८२ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण नौ मासा, शुद्ध पारद छः मासा, शुद्ध गन्धक छः मासा, त्रिकटुचूर्ण तथा सुहागाचूर्ण पृथक्-पृथक् एक तोला लेकर पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बना लें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला नींबू स्वरस के साथ अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको प्रलापान्तक-रस कहते हैं। यह रस विशेष रूप से प्रलापोपद्रव को नष्ट करता है और दीपन- पाचन करता है तथा अग्निमान्द्य को भी नष्ट करता है ॥ ३७६-३८२ ॥ उन्मादगजांकुशः धूर्तबीजं रसं गन्धं वङ्गं रौप्यं च मारितम् । समाहरेद्भिषग्वर्यः सर्वं तु समभागिकम् ॥ ३८३ ॥ कन्याम्भसा विमर्द्याथ वटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्मापयेत्प्रयत्नेन रसतन्त्रविशारदः ॥ ३८४ ॥ रसोऽयं तु समाख्यातो ह्युन्मादद्विरदांकुशः । हन्त्युन्मादं विशेषेण तथा ज्वरनिबर्हणः ॥ ३८५ ॥ उन्मादगजांकुशरसे—रौप्यं रजतम् , कन्याम्भसा कुमारीरसेन । उन्माद- द्विरदांकुश इति उन्माद एव द्विरदो हस्ती, तस्य वशीकरणाय अङ्कुश इवेति भावः ॥ ३८३-३८५ ॥ भा.टी.—शुद्ध धत्तूरबीजचूर्ण, शुद्ध पारद, शुद्ध गन्धक, वंगभस्म, रजत- भस्म, प्रत्येक समभाग में लेवें। पहिले पारे और गन्धक की कज्जली बनायें, फिर इसमें अन्य द्रव्यों के चूर्ण मिला घीकुंआर के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन