रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२० रसतरङ्गिणी भङ्गायाः प्रथमः शोधनप्रकारः मातुलानीं शुष्कपत्रां सलिले तु निमज्जयेत् । निष्पीड्य शुष्कां गव्याज्ये भर्जयेन्मन्दवह्निना ॥३६४॥ सुभृष्टामथ विज्ञाय सत्वरं तु समाहरेत् । इत्थं विशोधितां भङ्गां सर्वत्र विनियोजयेत् ॥३६५॥ भा.टी.—सूखी हुई भांग के पत्रों को जल में भिगोकर निचोड़ लें । अब इन पत्तों को धूप में सुखाकर गोघृत में मन्द-मन्द अग्नि से भून लें । जब अच्छी तरह भुन जायँ तो इन्हें नीचे उतार रख लें । इस तरह भांग के पत्ते शुद्ध हो जाते हैं । इन्हें सर्वत्र भांग के प्रयोगों में काम लायें ॥३६५॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः भङ्गां विशुष्ककामादाय बब्बूलत्वक्कषायतः । स्वेदयेद् घटिकार्द्धं तु मध्यमप्रानलयोगतः ॥३६६॥ विज्ञाय विजयां स्विन्नां घर्मे खलु विशाषयेत् । एवं संस्वेदिता भङ्गां शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥३६७॥ एवं विशोधितां भङ्गां पिष्ट्वा गोदुग्धयोगतः । कामोद्दीपनयोगेषु विशेषेण नियोजयेत् ॥३६८॥ भङ्गा तिक्ता लघुस्तीक्ष्णा ग्राहिणी कफहारिणी । दीपना पाचनी चैव पित्तला मदकारिणी ॥३६९॥ भा.टी.—सूखे हुए भांग के पत्तों को लेकर उन्हें बबूर की छाल के क्वाथ में २५ या तीस मिनट तक मध्यम अग्नि में स्वेदन करें । जब अच्छी तरह से उबल जायँ तो क्वाथ से निकालकर धूप में सुखा लें । इस प्रकार बबूर के क्वाथ में उबाली हुई भांग उत्तम रूप से शुद्ध हो जाती है । उक्त विधि से शुद्ध की हुई भांग को गोदुग्ध के साथ पीसकर कामोद्दीपक योगों में विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है । भांग के पत्ते रस में कड़वे, लघुगुण और तीव्र प्रभावक होते हैं । इसका शरीर में, विशेषतः महास्रोतों में ग्राही प्रभाव होता है । इसके सेवन से कफप्रकोप शान्त हो जाता है, अग्नि दीप्त होती तथा आमरस का परिपाक होता है । इसके सेवन से शरीर में पित्त की वृद्धि होती है और नशा आता है ॥३६६–३६६॥ भङ्गाया विशिष्टगुणाः भङ्गा ह्युद्दीपनी चैव ध्वजभङ्गहरा परम् ।