रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२६ रसतरङ्गिणी अतीसारप्रशमनी स्वप्नमेहनिषूदनी ॥४३०॥ त्रैलोक्यविजया वटी-भङ्गासत्त्वं पूर्वोक्तेन विधिनेति वन्यौषधिसत्त्वनिर्माणसाध- नेन यन्त्रविज्ञानीयोक्तेन बाष्पस्वेदनयन्त्रेण साधनीयम्। स्पष्टमन्यत्॥४२७-४३०॥ भा.टी.—वन्य-औषधि-सत्व-साधन-विधि से बनाया हुआ भांग का सत्व तीन भाग, वंशलोचनचूर्ण तीन भाग लेकर दोनों एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके अच्छी तरह सावधानी से एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इन गोलियों को त्रैलोक्यविजया वटी कहा जाता है। यह वटी सेवन करने पर प्रलाप, उन्माद को शान्त करती और वृक्क शूल को नष्ट करती है। माहवारी के समय होनेवाले रजःकष्टजन्य शूल को दूर करती और राजयक्ष्मा के कास को मिटाती है। इसके सेवन से पुरातन अतीसार नष्ट हो जाता है और स्वप्नदोष होना बन्द हो जाता है ॥४२७-४३०॥ त्रैलोक्यसंमोहनरसः त्रैलोक्यविजयां शुद्धां भानुतोलकसंमिताम् । हिंगुलं रससिन्दूरं घनसारं लवंगकम् ॥४३१॥ अभ्रकं शङ्खभसितं पृथक् तोलकसंमितम् । गोक्षुरो वानरीबीजं तथा कर्कटशृङ्गिका ॥४३२॥ चूर्णीकृतं पृथक् चैतत्तोलकद्वयसंमितम् । समादाय भिषग्वर्यः सप्तधा सुविधानतः ॥४३३॥ भङ्गायाः शतपुत्र्याश्च स्वरसेन विभावयेत् । निर्मापयेत्तु वटिका रक्तित्रितयसंमिताः ॥४३४॥ यतः स्मरस्यापि कटाक्षपातैः स्त्रीणां तु संमोहनकारिणीनाम् । संमोहनं वै विदधाति तस्मात् त्रैलोक्यसंमोहनसंज्ञकोऽयम् ॥४३५॥ वामावश्यकरः परं रुचिकरः क्लैब्यापहारी पर हर्षोत्साहकरो धृतिस्मृतिकरः शुक्रातिसंस्तम्भनः । पुत्रोत्पत्तिकरो रतिप्रियकरः सर्वत्र सौख्याकरः सेव्योऽयं खलु कामिभी रसवरस्त्रैलोक्यसंमोहनः ॥४३६॥ त्रैलोक्यसंमोहनः—भङ्गा शुद्धा १२ तोलकप्रमिता। वानरीबीजं आत्मगुं- प्ताबीजम्। शतपुत्री शतावरी ॥४३२-४३६॥ भा.टी.—शुद्ध भांग की पत्ती बारह तोला, शुद्ध हिंगुल, रससिन्दूर, कपूर तथा लौंग का चूर्ण, कृष्णाभ्रकभस्म, प्रत्येक एक-एक तोला। गोखरूबीजचूर्ण,